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Khamoshiyan

लप्रेक (लघु प्रेम कथा) नंबर 20:

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के रसायन विभाग से भागकर दोनों सीधा पंत पार्क पहुंचे।

रात की बतझक को लेकर शिखा किसी केमिस्ट्री की उबलती टेस्टट्यूब जैसे फड़फड़ा रही थी। बगल में खड़ा संदीप एक लिटमस पेपर जैसा अपना रंग खोज रहा था। उबलती हुई शिखा नें जैसे ही अपना अमल संदीप पर डालना शुरू किया।

तभी संदीप ने अपनी मुठ्ठी में कुछ छुपाते हुए शिखा के हथेली पर रख दिया।

“मैंने आजतक किसी केमिस्ट्री के सूत्र में सल्फ्यूरिक अमल का आइसक्रीम के साथ रासायनिक अभिक्रिया करते नहीं देखा।” शिखा नें बड़बड़ाते हुए कहा

“मेरे चेहरे पर का रंग भी तो कौन सा विलयन होने का संकेत दे रहा।” संदीप ने हंसते हुए कहा

फिर शिखा ने अपनी बैग में से काजल निकाला और आंखों ही आंखों में दोनों नें जाने कितने अपवाद रासायनिक समीकरण लिख डाले।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(30-अगस्त-2019)

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समझ

समझ है पर समझे नहीं थे तुम कभी,
समझना होगा तो समझ लेंगे तुझे भी।

ख्वाहिशें लड़ रही सपनो की तरफ से,
ज़रा सांस ले लेंगे तो जीत लेंगे उसे भी।

मुख़्तसर ही सही पर साथ चल ज़रा,
फलक से दो चाँद लाकर देंगे तुझे भी।

कोई खिताब हासिल करना चाहत नहीं,
मुख़ातिब हो मुझसे खोज लेंगे उसे भी।

– मिश्रा राहुल | डायरी के पन्नो से
©खामोशियाँ-2018 | 31 – मई – 2018

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अल्फाज़

अल्फाज़ फाड़कर सिलते क्यूं हो,
रोज थोड़ा थोड़ा लिखते क्यूं हो।

काठ के दराज़ ऐसे गुफ्तगू करते,
पुरानी वसीयत में मिलते क्यूं हो।

मतला कहो फिर ग़ज़ल सुनाओ,
रदीफ़ काफियों से जलते क्यों हो।

शहरी खिड़कियाँ हैं चमकते रहती,
इतना भी आंखों को मलते क्यूं हो।

तारो से गुजारिश करो मान जाएंगे,
जुगनुओं से इतना लड़ते क्यों हो।

ज़िन्दगी है अपनी कारवां है अपना,
हर पल तुम इतना चलते क्यों हो।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(01-अप्रैल-2019) | (डायरी के पन्नो से)

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दुवाएँ

जो जल रहा उसे और जलाया करिये,
कुछ देर ही सही पर मुस्कुराया करिये।

अजीब शौक तुझे प्याली सजाने का,
किसी अपने को शाम बुलाया करिये।

खुल जाएगी अमीरज़ादों की कलई,
उनके चेहरे का नकाब हटाया करिये।

कमियाँ खोजनी नही पड़ेगी आपको,
रिश्तेदारों के घर हर रोज जाया करिये।

अंजाम दुआओं में निकलकर आएगा,
हर किरदार मनभर कर निभाया करिये।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(17-मार्च-2019)(डायरी के पन्नो से)

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गाँव

लोग गाँव से जैसे शहर आते है,
खुद में ही डूबते नज़र आते है।

चेहरे पर हंसी रोककर रखे कैसे,
अपने ही ख्वाबों से डर जाते हैं।

इस टीन की छप्पर में सुकून है,
कुछ देर और यहां ठहर जाते है।

बचपन में ढूंढा था जिन रंगों को,
फिरसे तितलियों के घर जाते है।

लम्हों की अपनी कहानियां होती,
जिसे सुनाकर लोग गुजर जाते है।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(06-मार्च-2019)(डायरी के पन्नो से)

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सरफरोशी की तमन्ना

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बांजुए कातिल में है

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बातचीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला-सा हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूं खडा मौकतल* में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसि के दिल में है
दिल में तूफानों कि टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहां मंज़िल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफानों से क्या लडे जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बांजुए कातिल में है

* मौकतल  =  वह स्थान जहाँ मृत्युदंड दिया जाता है

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मैं गीत वही दोहराता हूँ

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

जो दौड़ कभी था शुरू किया,
उस पर दम भी भरता हूँ।
हर रोज ही अपनी काया को,
तेरे पर अर्पित करता हूँ।

कुछ बीज अपने सपनो के,
मैं खोज खोज के लाता हूँ।
एक कल्पतरु लगाने को,
मैं रीत वही दोहराता हूँ।

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

दो हाथ जुड़े कई हाथ मिले,
कुछ मोती से मुक्ताहार बने।
जो साथ चले वो ढाल दिए,
हम रणभेरी से हुकार किए।

हर बाधा से दो-चार किए,
हम ताकत से प्रतिकार किये।
फिर वही से मैं सुनाता हूँ,
मैं प्रीत वही बताता हूँ।

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

– खामोशियाँ | (20 – फरवरी – 2018)

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ख्वाहिशें

कुछ ख्वाहिशें हम भी पालना चाहते हैं,
थोड़ा ही सही पर रोज मिलना चाहते है।

मरने का कोई खास शौक नहीं है हमें,
जिंदा रहकर बस साथ चलना चाहते हैं।

रोज आता चाँद पुरानी बालकनी पर,
ऐसी ही कुछ आदतें डालना चाहते हैं।

यादों के कोरों में बूंद जैसा रिसकर,
अकेली नुक्कड़ पर घुलना चाहते है।

कभी मिलो ज़िंदगी फुरसत में मुझसे,
तेरे साथ एक सुबह खिलना चाहते हैं।

©खामोशियाँ-2018 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(05-सितंबर-2018)

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दुनिया

कुछ जरूरतें तेरी तो कुछ हमारी है,
इन बातों में उलझी दुनिया सारी है।

मोहब्बत की मुखबिरी कौन करता,
पूरा शहर ही इस खेल का मदारी है।

हर शख्स किसी मीठी जेल में होता,
खाकर सबने अपनी सेहत बिगाड़ी है।

चेहरे की मुस्कान उनको पचती कहाँ,
दुख बाटना ही जिनकी दुकानदारी है।

फेट रहा हूँ पत्ते लौटाने सबकुछ आज,
तेरी उम्मीद ही तेरी असल बीमारी है।

©खामोशियाँ – 2018 | मिश्रा राहुल
(26 – जुलाई -2018)(डायरी के पन्नो से)

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बात

baat-misra-raahul

तुम बात करो या ना करो पर रूठो ना,
इस कदर उलझाकर मुझको कोसो ना।

मैंने सौदे किए तुमसे अपनी चाहतों का,
कभी इस तरीके से मुझको सोचो ना।

चुप हूँ मैं कि दर्द देना नहीं और तुम्हे,
सन्नाटों नें कैसे जकड़ा मुझको पूछो ना।

जुगनू सितारे सब अपने घरों में सोए,
यूं अकेली रात में किसीको खोजो ना।

– मिश्रा राहुल | 27 – मई – 2018
(©खामोशियाँ) (डायरी के पन्नो से)

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