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Category: गज़ल

समझ

समझ है पर समझे नहीं थे तुम कभी,
समझना होगा तो समझ लेंगे तुझे भी।

ख्वाहिशें लड़ रही सपनो की तरफ से,
ज़रा सांस ले लेंगे तो जीत लेंगे उसे भी।

मुख़्तसर ही सही पर साथ चल ज़रा,
फलक से दो चाँद लाकर देंगे तुझे भी।

कोई खिताब हासिल करना चाहत नहीं,
मुख़ातिब हो मुझसे खोज लेंगे उसे भी।

– मिश्रा राहुल | डायरी के पन्नो से
©खामोशियाँ-2018 | 31 – मई – 2018

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अल्फाज़

अल्फाज़ फाड़कर सिलते क्यूं हो,
रोज थोड़ा थोड़ा लिखते क्यूं हो।

काठ के दराज़ ऐसे गुफ्तगू करते,
पुरानी वसीयत में मिलते क्यूं हो।

मतला कहो फिर ग़ज़ल सुनाओ,
रदीफ़ काफियों से जलते क्यों हो।

शहरी खिड़कियाँ हैं चमकते रहती,
इतना भी आंखों को मलते क्यूं हो।

तारो से गुजारिश करो मान जाएंगे,
जुगनुओं से इतना लड़ते क्यों हो।

ज़िन्दगी है अपनी कारवां है अपना,
हर पल तुम इतना चलते क्यों हो।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(01-अप्रैल-2019) | (डायरी के पन्नो से)

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दुवाएँ

जो जल रहा उसे और जलाया करिये,
कुछ देर ही सही पर मुस्कुराया करिये।

अजीब शौक तुझे प्याली सजाने का,
किसी अपने को शाम बुलाया करिये।

खुल जाएगी अमीरज़ादों की कलई,
उनके चेहरे का नकाब हटाया करिये।

कमियाँ खोजनी नही पड़ेगी आपको,
रिश्तेदारों के घर हर रोज जाया करिये।

अंजाम दुआओं में निकलकर आएगा,
हर किरदार मनभर कर निभाया करिये।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(17-मार्च-2019)(डायरी के पन्नो से)

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गाँव

लोग गाँव से जैसे शहर आते है,
खुद में ही डूबते नज़र आते है।

चेहरे पर हंसी रोककर रखे कैसे,
अपने ही ख्वाबों से डर जाते हैं।

इस टीन की छप्पर में सुकून है,
कुछ देर और यहां ठहर जाते है।

बचपन में ढूंढा था जिन रंगों को,
फिरसे तितलियों के घर जाते है।

लम्हों की अपनी कहानियां होती,
जिसे सुनाकर लोग गुजर जाते है।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(06-मार्च-2019)(डायरी के पन्नो से)

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ख्वाहिशें

कुछ ख्वाहिशें हम भी पालना चाहते हैं,
थोड़ा ही सही पर रोज मिलना चाहते है।

मरने का कोई खास शौक नहीं है हमें,
जिंदा रहकर बस साथ चलना चाहते हैं।

रोज आता चाँद पुरानी बालकनी पर,
ऐसी ही कुछ आदतें डालना चाहते हैं।

यादों के कोरों में बूंद जैसा रिसकर,
अकेली नुक्कड़ पर घुलना चाहते है।

कभी मिलो ज़िंदगी फुरसत में मुझसे,
तेरे साथ एक सुबह खिलना चाहते हैं।

©खामोशियाँ-2018 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(05-सितंबर-2018)

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दुनिया

कुछ जरूरतें तेरी तो कुछ हमारी है,
इन बातों में उलझी दुनिया सारी है।

मोहब्बत की मुखबिरी कौन करता,
पूरा शहर ही इस खेल का मदारी है।

हर शख्स किसी मीठी जेल में होता,
खाकर सबने अपनी सेहत बिगाड़ी है।

चेहरे की मुस्कान उनको पचती कहाँ,
दुख बाटना ही जिनकी दुकानदारी है।

फेट रहा हूँ पत्ते लौटाने सबकुछ आज,
तेरी उम्मीद ही तेरी असल बीमारी है।

©खामोशियाँ – 2018 | मिश्रा राहुल
(26 – जुलाई -2018)(डायरी के पन्नो से)

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बात

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तुम बात करो या ना करो पर रूठो ना,
इस कदर उलझाकर मुझको कोसो ना।

मैंने सौदे किए तुमसे अपनी चाहतों का,
कभी इस तरीके से मुझको सोचो ना।

चुप हूँ मैं कि दर्द देना नहीं और तुम्हे,
सन्नाटों नें कैसे जकड़ा मुझको पूछो ना।

जुगनू सितारे सब अपने घरों में सोए,
यूं अकेली रात में किसीको खोजो ना।

– मिश्रा राहुल | 27 – मई – 2018
(©खामोशियाँ) (डायरी के पन्नो से)

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राज

इतने दिनों तक तो चुप था दिल,
चल उसे भी कुछ कहने देते हैं।

आ जाएगी अपने रिश्तों में चमक,
खुद को अंदर तक जलने देते हैं।

कब तक सहेज पाएंगे राज अपने,
खोल किताब उनको पढ़ने देते हैं।

एक अधूरी गज़ल पड़ी बरसों से,
चलो किसी को पूरा करने देते हैं।

चुप रहकर पत्थर हो गया था मैं,
हर रोज कुछ आदतें पलने देते हैं।

यूं ही नहीं बातों में ज़िक्र अपना,
दिल पर मीठा जुल्म सहने देते हैं।

– मिश्रा राहुल (13-मई-2018)
(©खामोशियाँ-2018) (डायरी के पन्नो से)

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चित्र

अब देख रहा हूँ तुझे मेरी फिक्र नहीं है,
इस बदले लहज़े में अपना ज़िक्र नहीं है।

गुलाब आज भी महकता पुरानी डायरी से,
बहुत खोजा इसके पास कोई इत्र नहीं है।

बहुत सारे कदम तो मेरे भी उसने चले हैं,
ऐसे कैसे कह दूं कि वो मेरा मित्र नहीं है।

जो दीवारों पर टंगा वो बसा है यादों में,
काठ के खांचों का बस एक चित्र नहीं है।

©खामोशियाँ-2018 | मिश्रा राहुल
(22 – अप्रैल – 2018)(डायरी के पन्नो से)

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अंजान

तलाश कर शागिर्द अपना तू अंजान थोड़े है,
अपने शहर में घूम रहा तू मेहमान थोड़े है।

आ जाएगी रोशनी अपना रास्ता बदल कर,
तेरे घर में बस एक ही रोशनदान थोड़े है।

कभी दिल से उछालो किस्मती पत्थर यारों,
हर छत पर बस एक ही आसमान थोड़े है।

खिलते नहीं हैं फूल पत्थर की तासीर पर,
ये किसी का आंगन है तेरा बागबान थोड़े है।

– मिश्रा राहुल | खामोशियाँ-2018
(डायरी के पन्नो से)(09/मार्च/2018)

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