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Category: कविता

सरफरोशी की तमन्ना

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बांजुए कातिल में है

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बातचीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला-सा हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूं खडा मौकतल* में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसि के दिल में है
दिल में तूफानों कि टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहां मंज़िल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफानों से क्या लडे जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बांजुए कातिल में है

* मौकतल  =  वह स्थान जहाँ मृत्युदंड दिया जाता है

3

मैं गीत वही दोहराता हूँ

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

जो दौड़ कभी था शुरू किया,
उस पर दम भी भरता हूँ।
हर रोज ही अपनी काया को,
तेरे पर अर्पित करता हूँ।

कुछ बीज अपने सपनो के,
मैं खोज खोज के लाता हूँ।
एक कल्पतरु लगाने को,
मैं रीत वही दोहराता हूँ।

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

दो हाथ जुड़े कई हाथ मिले,
कुछ मोती से मुक्ताहार बने।
जो साथ चले वो ढाल दिए,
हम रणभेरी से हुकार किए।

हर बाधा से दो-चार किए,
हम ताकत से प्रतिकार किये।
फिर वही से मैं सुनाता हूँ,
मैं प्रीत वही बताता हूँ।

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

– खामोशियाँ | (20 – फरवरी – 2018)

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मुझमें समा ना

छोड़
ना दलीलें
दुनियादारी की।

तू
अपना हक
जाता ना,

तू
फिर से
मुझमें समा ना।

दो बातें
पुरानी करनी।
दो रातें
साथ जगनी।

कुछ
खिस्से फिर
बतला ना।

तू
फिर से
मुझमें समा ना।

दुनिया
परायी सी
लगती है।

तन्हा
सतायी सी
लगती है।

तू
बातों का
जादू चला ना।

तू
फिर से
मुझमें समा ना।

रोज
खोजता हूँ
वो अक्स तेरा।

कितना
प्यारा सा
खिलखिलाता चेहरा

तू
खुल के
सब बता ना।

तू
फिर से
मुझमें समा ना।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल | २२-०५-२०१५

1

गुस्सा



गुस्सा आए तो फिर क्या करे,
मुंह फुलाए या हम गुस्सा करे।

ढूंढ रहे आज भी लोग ऐसे हम,
जिन पर जीभर हम गुस्सा करे।

खो जाते मेरे हिस्से के सितारे,
टूटते जाए वो हम गुस्सा करे।

भूल ना जाए खो ना जाए ऐसे,
मुझे मनाए गर हम गुस्सा करे।

वक़्त बदलता है तो बदल जाए,
मन ना भाए तो हम गुस्सा करे।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(०८-सितंबर-२०१४)

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शतरंज ज़िंदगी की

शतरंज की
बिसात पर,
उलझे पड़े
मोहरे बेईमान।

घोड़ा अपनी
चाल भूला,
हाथी ने
अपना ध्यान।

वज़ीर लेकर,
भागा रानी।
राजा खड़े
रहे मचान।

ऊंट पड़ा
समतल में,
प्यादे बन
गए मेहमान।

सब एक-एक
कर बदले चेहरे,
नकाब लगा
निकले इंसान।

काले-सफ़ेद के
खेल में परखा,
अपनो की
असली पहचान।
_________________
शतरंज ज़िंदगी की – डायरी के पन्नो से
©खामोशियाँ-२०१४//११-अगस्त-२०१४

2

बड़ा दूभर है आजकल

शब्दों की बगिया में घुसना,
बड़ा दूभर है आजकल..!!
यादों को पैरो तले रौदना,
बड़ा दूभर है आजकल….!!

सुना….अब कोई आता नहीं,
सुना….अब कोई जाता नहीं,
बूढ़ी तख्त पर अकेले बैठना,
बड़ा दूभर है आजकल….!!

खर्राटों के सुरीले गानो से,
सन्नाटो के कटीले तारो से,
सर झुकाकर खुद निकलना,
बड़ा दूभर है आजकल….!!

सब सामने लूटते देखना,
बड़ा दूभर है आजकल….!!
सब सामने कटते देखना,
बड़ा दूभर है आजकल….!!
____________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(१८-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

3

हर तर्को का यजमान हूँ मैं

बस आकड़ों से खेलता रहता,
हर चर्चों का मेहमान हूँ मैं….!!
अकेले सैंकड़ों से लड़ता रहता,
हर तर्को का यजमान हूँ मैं….!!!

अमेरिका से इंग्लैंड पहुंचता,
रूस से उठता ज्वार हूँ मैं…!!!
वीटो-पावर लिस्ट दिखाता,
थका हारा हिंदुस्तान हूँ मैं…!!!

आर्मी अपनी कभी ना देखता,
फ्रांस को करता सलाम हूँ मैं…!!
अग्नि अपनी कभी ना सेंकता…
चीन का करता गुणगान हूँ मैं….!!!

चाय की चुस्की पर देश गटकता,
चाचा के ढाबे की शान हूँ मैं….!!
हर रोज़ सुबह तो यही पहुंचता…
थका हारा हिंदुस्तान हूँ मैं….!!!
________________

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(१६-०७-२०१४) (डायरी के पन्नो से)
4

बदलती ज़िंदगी

बदल रहा मौसम 

अब कुछ होने को है,
जो हुआ था कभी 
अब फिर होने को है।

यादें ठहरी कहाँ 

कुलाचे मार रही अब,
जिंदगी सारी हदें 
फिर पार करने को है।

पलकों की छांव में 

सपनों को बिठलाए,
ये मन एक बार फिर
फलक छूने को है।

©खामोशियाँ-२०१४

2

गलियों


गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो….!!!

हम दौड़-दौड़कर जहां से
पार्ले-जी लेकर आते थे,
जब सचिन-दादा बनकर,
आसमानी छकके लगाते थे…!!!
पाँच रूपये का मैच खेलकर,
सबके मन को भाते थे….!!!

गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो….!!!


चूरन-पुड़िया-कोला-गुड़िया,
आजभी लाती पागल बुढ़िया,
पर समय नहीं खेले-पुचकारे,
हँसकर उसको अम्मा पुकारे….!!

गिनती हाथो मे भाती थी,
हंसी तीन पैसो की आती थी,
तीन पैसे भी खर्च ना होते…
अम्मा की चिमटी आती थी….!!

गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो….!!!

हमने भी हीरो होते थे,
चाचा-डोगा सब होते थे…
साबू सबको प्यारा था,
ध्रुव सबका राज-दुलारा था….!!!

जब एक ही टीवी होती थी,
उसमे भी सीता रोती थी,
पूरे गाँव मे आँसू छाता था…
रावण दिल दुखलाता था…!!

गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो….!!!

©खामोशियाँ-२०१४ 
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विश्व पृथ्वी दिवस (२२ अप्रैल)


बढ़ती गलती फटती धरती,
झुलस जाता उसका चेहरा,
विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

गोद मे उसके खेलते बच्चे,
सर पर रहता हरदम पहरा,
गर्दन काट अलग कर देते,
दर्द दे जाते बड़ा ही गहरा।

विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

निर्झरिणी बैठी नहला देती,
कपड़े भी धो देता है पोखरा,
शर्म ना आती हमे कभी,
कर देते उसको भी संकरा।

विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

पवन चलता सांसें चलाता,
दिनकर देतें है जो पहरा,
वायु को दूषित करके हम,
सूरज से मोल लेते खतरा।

विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

विश्व पृथ्वी दिवस (२२ अप्रैल)

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

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