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Category: लघु कथा

दोस्त

रानीसार, बीकानेर से करीब सौ किलोमीटर पश्चिम की तरफ पाकिस्तान सीमा पर बसा एक छोटा सा गाँव। जहां गर्मी मे तापमान करीब 45 डिग्री रहता तो ठंड मे दुबुक कर 5 डिग्री तक चला जाता। सीमा पर होने की वजह से यह क्षेत्र कुछ ज्यादा ही संवेदनशील था।

अनिल अग्रवाल अपने छोटे से परिवार के साथ यही रहा करते थे। उनके परिवार मे अनिल बाबू उनकी बीबी और हीरो था। अनिल बाबू का कोई बच्चा नहीं था, वो हीरो पर ही अपनी जान छिटकते थे।

हीरो…उनका प्यारा सा ऊंट। अनिल बाबू की दुकान भी थी पास के क्षेत्र मे, बहुत बड़ी तो नहीं पर इतनी थी की उनका गुजर बसर हो जाता था। दुकान का नाम भी अनिल बाबू “हीरो मिष्ठान भंडार” ही रखे थे। उनके और हीरो के चर्चे पूरे गाँव मे छाए रहते थे। मजाल है कोई उनके दुकान मे आ जाए और बिना हीरो की सलामती पूछे चला जाए। अनिल बाबू गुस्सा हो जाते थे।

हीरो भी तो उन्हे काफी प्यार करता था। जब भी वो पास आते तो अपनी बड़ी सी गर्दन नीचे झुकाए कानो मे कुछ फुसफुसाता था। जो केवल अनिल बाबू ही समझते थे शायद।

अनिल अग्रवाल पेशे से हलवाई नहीं थे, पर श्रीमती के दूर ना जाने की हठ के वजह से उन्होने अपना मनपसंद काम छोड़ दिया था। हाँ मनपसंद काम, वो एक गाइड थे। जूनागढ़ का किला, लक्ष्मी निवास महल, लालगढ़ महल कभी उनके जुबान से चिपके रहते थे। अब तक तो सब भूल गए, पर हाँ यादें हैं अभी भी उनके पास ताज़ी बची। कैसे उन्होने हीरो को पाया था, कैसे उनके बीच दोस्ती बढ़ी थी।

फिर भी अनिल बाबू खुश थे। उनका कारोबार अच्छा चल रहा था हर दिन जैसे। आज सुबह सुबह उनको फोन आया दुकान का समान खत्म हो गया है। अनिल बाबू अक्सर शहर जाकर समान खरीद के लाते थे। इसी बहाने वो और हीरो घूम के भी आते थे। खाना बंध गया और सब निकलने वाले थे कि कुछ अनहोनी की आशंका ने माया अग्रवाल के चेहरे को ढाँप लिया। वो माना करने लगी ऐसा वो हमेशा तो नहीं करती थी। पर हीरो और अनिल बाबू कहाँ मानने वाले थे। आखिर महीने मे एक बारगी शहर जो घूमने को मिलता। दोनों निकल ही पड़े।

अभी कुछ पाँच मील ही चले होंगे की अचानक एक रेतीले तूफान उनके रास्ते मे अवरोध बनके खड़ा हो गया। तूफान इतना तगड़ा था कि अब तो अनिल बाबू को बस माया की कही हर बात सच जमाने लगी थी। अब तो तूफान और दहाड़ने लगा था आगे जाना मुमकिन नहीं था और हारकर हीरो-अनिल वापस लौटने की कोशिश करने लगे। करीब 15 मिनट बाद तूफान कुछ थमा। लौटते वक़्त अनिल के मन मे सैंकड़ों खयाल जन्म ले लेकर मर रहे थे। उन्हे आते-आते करीब डेढ़ घंटे लग गए। वो सोचते सोचते घर आ गए पर घर तो कहीं था नहीं, ना ही उनकी दुकान। माया को भी बहुत ढूँढे पर मिली नहीं।

थक हार कर बैठे अनिल बाबू को रामदरश मिस्त्री ने बताया भैया भौजी को काफी चोट लग गयी है पास के अस्पताल मे भर्ती है आप तुरंत पहुंचिए। आनन-फानन मे अनिल बाबू-हीरो जल्दी से वहाँ पहुंचे तो पता चला कि माया के सर मे गंभीर चोट आई है ऑपरेशन करना पड़ेगा। अब सर पकड़ बैठे अनिल बाबू की दुकान तो ईश्वर ने लील ली, बीबी बिस्तरा पकड़े बैठी है और बैंक मे इतने पैसे हैं नहीं की इलाज हो। अनिल बाबू को मानो क्या हो गया, बड़े ही सालीन विचारधारा के अनिल अग्रवाल को आजतक हमने इतना परेशान कभी नहीं देखा था। पास खड़े देवेन्द्र चाचा ने कहाँ बेटा अनिल देखो सुनील सिंह राजपूत से मदद लो अब वही कुछ मदद कर सकेंगे। सुनील सिंह उस जगह के साहूकार हुआ करते थे।

अनिल बाबू ने बिना समय गवाए तुरंत उनके यहाँ जाके के अपनी कहानी बतलाई। पर साहूकार कहाँ सुनते किसी की बस यही बोलते रहे कुछ हैं गिरवी रखने को तो बताओ वर्ण अपना समय ना खराब करो। अनिल बाबू के पास था ही क्या जो वो रखते शायाद कुछ नहीं। जाते जाते सुनील ने कहाँ “अनिल एक मशवरा दूँ, तुम्हारे पास एक ऐसी चीज है जिसके बदले मैं तुम्हें अच्छी ख़ासी रकम दे सकता हूँ। जिससे भाभी भी ठीक हो जाएंगी और तुम अपना कारोबार जिला भी सकोगे….ये ऊंट खड़ा है ये हमे दे दो।” इतना सुनते ही अनिल अग्रवाल अपना आपा खो बैठे, जाने क्या अनाब-सनाब बकने लगे सुनील सिंह को। फिर भी सुनील सिंह ने कहाँ अनिल अभी तुम परेशान हो हम तुम्हारी बात का बुरा नहीं माने कल तक बताना। रही बात ऊंट की तो जैसे ही तुम अपने पैसे चुकता करोगे लिए जाना उसे यहाँ से।

अनिल बाबू अब और जटिल धर्मसंकट मे फंस चुके थे। एक तरफ दुकान, दूसरी तरफ बीबी और अब हीरो सब उनको अपने पास से जाते हुए ही दिख रहे थे। अचानक एक रोज़ मे जैसे उनपर पहाड़ सा टूट पड़ा था। उन्होने हीरो को प्यार से पुचकारा। हीरो भी बार बार भाभी की ओर इशारा कर कुछ समझाना चाह रहा था। शायद अनिल बाबू समझ भी रहे थे पर आज उनकी समझ उनके लगाव पर हावी नहीं हो पा रही थी। पर हीरो ने उन्हे माना ही लिया, ठीक उसी तरह गर्दन झुका के कान मे कुछ फुसफुसाया जो केवल अनिल बाबू समझते थे।

भोर हुई और हीरो को लेकर सुनील सिंह के यहाँ पहुँच गए अनिल बाबू। बात पक्की हो गयी। जाते जाते अनिल बाबू ने हीरो के माथे को चूमा और दिलासा दिया बहुत जल्द आने का। आँखें तो नाम थी हीरो की भी और अनिल बाबू की भी पर शायद नियति को दोनों मे से किसी पर भी तरस नहीं आ रहा था।

ऑपरेशन की फीस जमा हुई। भाभी का ऑपरेशन सफल हो गया। अनिल बाबू ने अपनी जी जान लगा कर फिर से कारोबार फिर से उठा लिया। पर अनिल बाबू को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था हीरो के बिना। वो रोज़ कुछ पैसे जूटाकर एक बक्से मे रखते जाते। कलेंडर पर निशान चढ़ते गए और साथ ही बक्सो मे रुपये जमते गए। कुछ यही चार-पाँच महीने बीते और वो दिन आ गया।

अनिल अग्रवाल चेहरे पर चमक और हाथो मे रुपये लिए चल पड़े साहूकार के घर की ओर। मन मे तरह-तरह के विचारो को थामे। बड़े प्रफुल्लित लग रहे थे, आज मालूम हो रहा था अनिल फिर से जी उठे है। पर पहुँचते उन्होने पाया की साहूकार के यहाँ ताला पड़ा है। थोड़ी जांच पड़ताल पर पता चला कि वो लडेरा गए हैं, शायद किसी ऊंट महोत्सव मे। अनिल बाबू इतना सुनते ही भागे भागे पहुंचे वहाँ।

ऊंट महोत्सव इनता भरा-भरा सा था की आदमी पहचान पाना मुश्किल सा हो रहा था। काफी खोज के बाद वो थक से गए। तभी ऊंट प्रतियोगिता की घोषणा ने उनकी तत्परता और बढ़ा दी। काफी-सारे ऊँटो के बीच खड़ा हीरो को देख उनसे रहा ना गया। वो अंदर जाकर उससे मिलने की कोशिश करने लगे। पर किनारे पर लगे तारों और काफी सख्त सुरक्षा ने उन्हे वहाँ जाने से पहले ही रोक दिया।

रेस शुरू हो चुका था। सभी अपने ऊंट लेकर दौड़ रहे थे। हीरो पर सवार चालक उसे बुरी तरह पीट-पीट कर दौड़ाए जा रहे थे। चालक की हर वार से अनिल बाबू का सीना छलनी हो जाता था। रेस खत्म हुआ और हीरो विजयी घोषित हुआ, पर अनिल बाबू की खुशी की वजह उसकी जीत ना थी बल्कि सिर्फ हीरो था। हीरो गले मे विजयी तमगा लिए सुनील सिंह राजपुत के साथ आ रहा था कि अनिल बाबू ने उन्हे रोक लिया। सुनील को शायद इस बात का अंदेशा नहीं था कि वो इतनी जल्दी हीरो को लेने आ जाएगा। फिर भी सुनील ने एक और चाल चली, “अनिल एक बात बोलू तुम मुझसे जीतने चाहे पैसे ले लो पर ये ऊंट हमको दे दो”

अबकी बार अनिल बाबू रुकने वाले नहीं थे। सीधा बोल दिया “आप हमको वो कीमत नहीं दे पाएंगे जिससे एक दोस्त को खरीदा जा सके साहूकार बाबू, हर वस्तु पैसों से नहीं खरीदा जा सकता। “आप अपने पैसे रखिए और हमारा दोस्त हीरो मुझे वापस कर दीजिये। सुनील को अब ऊंट की हैसियत का अंदाज़ा अनिल के जीवन के परिपेक्ष मे हो चुका था। उसने लगाम अनिल को पकड़ा दी और कहा हाँ अनिल तुम्हारा दोस्त सच मे हीरो ही है। अनिल बाबू ने लगाम तुरंत निकाल हीरो से लिपट के रोने लगा।

हीरो ने अपनी गर्दन हल्की सी झुकाई और अनिल के कान मे कुछ फुसफुसाया। अबकी बार वो बात केवल अनिल ही नहीं बल्कि सबकी समझ मे आ चुकी थी।

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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ख्वाब


रात तकिये नीचे सेलफोन में उँगलियाँ स्क्रॉल करते कब सो गया पता नहीं चला। आजकल बहुत नीचे चले गए हैं कुछ फोटोग्राफ्स, जो कभी मोबाइल की पहली ग्रिड में अपना सीना तानकर खड़े रहते थे।


सपने सच बोलते वहाँ ज़ोर कहाँ चलता किसी का। कल आई थी चुप-चाप थी गुमसुम थी उलझी थी बिखरी थी लटें। ज़ुल्फों को उँगलियों से कंघा भी किया उसने देखकर मुस्कुराया। बोला नहीं सुना है सपनों में बोला नहीं करते शोर से टूट जाता बहुत कुछ। कुछ पल के लिए ठहर गया था समा। 

बस समझो मज़ा आ गया था।

– मिश्रा राहुल | खामोशियाँ-2016
(डायरी के पन्नो से) (24-02-2016)

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छोटी सी पहल – लघु कथा

बरसात में भीगती शाम में अकेले तनुज अपनी दूकान में बैठा रास्ता निहार रहा था सुबह से एक भी कस्टमर दुकान के अन्दर दाखिल नहीं हुआ। तनुज से बाजू में रखी ईश्वर की मूर्ति निहारी थोडा दिमाग पे जोर भी डाला फिर मन ही मन बडबडाया ” पिछले एक हफ्ते से आखिर कोई दूकान में आता क्यूँ नहीं। पूजा भी किया है भरपूर नारियल भी तोड़ा मंदिर में। फिर भी भगवान में मेरी किस्मत तोड़ रखी है।”

यही सब भुनभुनाता तनुज फिर से रास्ते को निहारने में जुट गया। वो एक बार बहार झांकता फिर वापस अपने दराज पर देखता। चार दस के नोट दो बीस के और एक पचास के कुल मिलकर हुए 130 रुपये। उसी 130 रूपए को हजारों बार गिन चूका था। तनुज घर का बस एक कमाने वाला उसके घर का चूल्हा बस तनुज की कमाई पर चलता है। हाँ एक बीबी है एक बेटी है परी। बीबी के जरुरत के सामान बेटी के स्कूल का खर्च। बहुत सारा दबाव में रहता तनुज आजकल। घर पहुँचता तो सारा परिवार एक आस की निगाह से उसे देखता, पर तनुज एक पास उसके एक प्यार भरी मुस्कान के अलावा और कुछ नहीं देने के लिए।

दो पहर क्या दो दिन में एक बार चूल्हा जलता। जिस दिन थोड़ी कमाई हो जाती पेट की आग बुझ जाती नहीं तो दो जून की रोटी जुटाने तक की भी कमाई नहीं हो पाती। ऊपर से दूकान का भाड़ा भी दिन बदिन चढ़ता जाता। रोज दूकान मालिक आके गली-गलौज कर जाता। बिटिया की स्कूल फीस जमा नहीं हो पाई थी इसीलिए उसका नाम स्कूल वालों नें काट दिया था। इधर तनु भाभी भी बीमार ही रहती थी। पर गरीबों की बीमारियाँ देखता कौन है लोग क्या पल्ला झाड़ेंगे ईश्वर ही कभी नहीं झाँकता उनके तरफ।

साक्षी भाभी बड़ी उत्कृष्ठ विचार धारा साधारण सी महिला थी। साधारण कहना थोड़ा सा गलत होगा वो असाधारण महिला थी। पढ़ी लिखी तो नहीं थी पर अनुभव की मिट्टी नें उन्हे इतना पका दिया था कि समाज की हर बारीकियों से वाकिफ थी। तनुज अपनी विवशता बताता तो नहीं था पर उसको देखकर ही साक्षी सब कुछ समझ जाती थी।

तनुज एक मोबाइल रीचार्ज दुकान चलाने वाला आम आदमी। वैसे तो तनुज की दुकान मेन रोड पर थी। आम तौर पर अच्छी-खासी चलती थी। पर बीते कुछ दिनों से दुकान भी फीकी थी और उसकी रंगत भी गायब। तनुज गहरी सोच में डूब गया आखिर ऐसा हुआ क्या कि लोगों नें रीचार्ज भरवाना बंद कर दिया। मोबाइल तो सबके हाथों में हर रोज देखता था वो, साथ ही बात करते भी। वो सोचता रहा और जाने क्या क्या अपने दिमाग में उलझाता रहा। लेकिन आज भी दिन जस का तस ही रहा। फिर वहीं मालिक का ताना और फिर वही भगवान को कोसना। पर आज कुछ बदला था हाँ तनुज का व्यवहार। तनुज तिलमिला उठा।

उसनें बड़े गुस्से से शटर की कुंडी खींच कर नीचे पटक मारा। जैसे यूं हो की दुनिया भर का गुस्सा उसनें उस शटर पे उतार कर बदला ले लिया हो। घर पहुंचा तो नन्ही बिटिया परी दौड़कर उसके पास आई। तनुज झल्ला कर उसको एक थप्पड़ मार दिया। परी रोते-रोते साक्षी से लिपट गयी। उसको रोता देख साक्षी की आँख से एक आँसू उसके गालों को छूता हुआ जमीन पर दम तोड़ दिया। तनुज नें एक शब्द नहीं बोला और सीधा कमरे में जाकर लेट गया। आँख बंद करके कुछ सोच रहा था। पर अचानक उसने अपने माथे पर हौले-हौले से सहलाहट को महसूस किया।

तनुज आँख बंद करते ही बोल रहा था। “साक्षी जाओ मुझे अकेले रहने दो थोड़ी देर सही। थोड़ी देर में मैं सम्हाल लूँगा खुद को।” बहुत मिन्नते करने पर भी जब सहलाना बंद ना हुआ तो तनुज फिर झल्लाया “साक्षी तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है मैं कह रहा न जाओ यहाँ से।”

“पर मैं साक्षी नहीं पापा मैं तो परी हूँ” एक हल्की सी आवाज नें पूरे झल्लाहट को रौदकर रख दिया।

तनुज नें सर घूमकर परी को देखा तो दंग रह गया उसके पांचों उँगलियों की लाल स्याही अपने गोरे से गाल पर लगाए परी उसके सर को सहलाए जा रही थी। तनुज परी को गले लगा लिया। उसका गला भर गया। परी तनुज से ऐसे चिपकी हुई जैसे छोटी सी खिलौने वाली गुड़िया बचपन में बच्चे सीने में चिपका लेते। तनुज के आँख रिसने लगे। परी नें दोनों हाथो से उनके आँसू पूछ दिया और एक हल्की सी मुस्कान दे दी। मंजर मानो ऐसा कह रहा हो पापा नें बिटिया से माफी मांग लिया और बेटी नें भी उन्हे माफ कर दिया।

“तनुज!! मुझे पता है तुम्हारी दुकान नहीं चल रही। तुम नहीं बताओगे तो क्या मैं जान नहीं पाऊँगी।” साक्षी नें तनुज से कहा

“हाँ!! पर मैं बताकर तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था। वैसे भी तुम खुद ही बीमार हो परेशान हो इस पर अगर मैं तुम्हारा खयाल नहीं रख सकता पैसे नहीं ला सकता तो कम से कम तुम्हें एक हल्की मुस्कान तो दे सकता।” तनुज नें कहा

“हाँ दिया तो तुमने बड़ी अच्छी सी मुस्कान परी के गाल पर अभी भी चिपकी है वो देख लो।“ साक्षी नें गंभीरता से कहाँ

“शर्मिंदा हूँ मैं अपने किए पर।“ तनुज नें सफाई में बस इतना सा बोला

तनुज नें आज ठान लिया की पूरी बात साक्षी को बता देगा। तनुज नें बोलना शुरू किया। कल मनीष आया था दुकान पर हाल-चाल लेने। अरे मनीष(लंदन वाले) तनुज नें साफ किया। मैंने भी उसको अपनी दिक्कत बताई। मनीष नें बात को बारीकी से आज समझाया की क्या तनुज आजकल ऑनलाइन रीचार्ज की दुनिया में तुम ये धंधा खोल कर बैठे हो। अब तो लोग इंटरनेट से घर बैठे अपने कार्ड से रीचार्ज कर लेते है।

“घर बैठे रीचार्ज कर लेते है। मनीष क्या मज़ाक कर रहे हो।“ मैंने उत्तेजना में पूछा

हाँ यार देखो कुछ बड़े ऑनलाइन रीचार्ज जैसे पेटीएम, फ्रीचार्ज, मोबीक्विक बड़े आसानी से और सरलता से रीचार्ज के ऑप्शन दे रहे वो भी घर बैठे। फिर कोई तुम्हारे यहाँ क्यूँ आएगा। साथ ही साथ वो कूपन भी देते कुछ कंपनियों के साथ उनकी करार है। उन कंपनियों से खरीददारी करने पर छूट भी मिलती।

“मनीष मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। अब तुम बोल रहे हो तो सब होता होगा। लेकिन इन बड़े लोगों के आने से देखो हमारी माली हालत कैसी हो गयी है।“ मैंने कहा

साक्षी चुपचाप सब सुनते जा रही थी।

“हाँ तनुज बात तो सही है पर इतना ध्यान कौन देता। लोग अपनी सहूलियत देखते बस। अच्छा तनुज मेरे लायक कोई सेवा होगी तो बताना। अभी थोड़ा जल्दी में हूँ। संकोच ना करना तू मेरा जिगरी यार है बस इतना याद रखना।“ मनीष नें मोबाइल कान में लगते वहाँ से चल दिया

“ये सब ही है साक्षी दिक्कत। अब मैं क क क”

साक्षी नें तनुज की बात बीच काटते हुए टोका, “दिक्कत क्या है। मेरे पास एक उपाय है। जिससे तुम्हारी सारी तो नहीं पर कुछ उलझाने दूर हो जाएंगी। लेकिन हिम्मत रखना होगा”

“बोलो साक्षी” तनुज नें हुंकारी भर दी।

“तुम रीचार्ज का धंधा छोड़ दो ना।” साक्षी ने दो टूक कहा

इतना सुनते तनुज के हाथ पाँव सुन्न हो गए। आँख धूधलाने लगी मानो किसी गहरी सोच में डूब गया हो तनुज।

“साक्षी वो सिर्फ दुकान नहीं है मेरे लिए धरोहर है। भैया के चलाते थे उनकी यादें है। इसीलिए दुकान का नाम अम्मा के नाम पर रखा है। इतनी सारी यादों को दफन कर दूँ। पगली पाप करवाएगी तू। ना नहीं होगा मेरे से ये।“ तनुज नें फैसला सुना दिया

“मेरी बात तो सुनो। बस काम बदलने को कह रही हूँ ना नाम ना दुकान। थोड़ी मदद मनीष भैया से ले लो उन्होने कहा है ना जरूरत पे याद करना। बाद में उनका उधार चुका देंगे।” साक्षी नें अपनी बातों में बारीकियाँ जोड़ दी

तनुज को मनीष से पैसे मांगने में ही संकोच होगा। यही सोचकर उनसे गर्दन तो हिलाई पर साक्षी समझ गयी थी तो संतुस्ट नहीं।

बात चीत में सुबह आ धमकी पता ही नहीं चला। तनुज घर से निकला दुकान जाने के लिए पर चौराहे पर आकर रुक गया। उसके कदम डगमगा रहे थे मनीष के घर को मुड़े या फिर अपनी पुरानी किस्मत को गले लगाए। इस उधेड़बुन में उसनें करीब चालीस मिनट लगा दिये। साथ ही उसके आँखों के आगे हर मंजर चलते जा रहे थे। लेकिन घर से निकलते वक़्त उसने परी के गालों पर अपनी उँगलियों की मोहर देखी थी वो ओझल नहीं हो रही थी। आखिरकार चल दिया तनुज मनीष के घर।

मनीष नें तनुज की मदद कर दी होगी। तनुज एक नया धंधा शुरू भी कर लिया होगा। साथ ही उसका धंधा अच्छा भी चला होगा। तनुज-साक्षी-परी फिर खुशहाल हो गए होंगे शायद। तनुज अपनी उधारी भी चुका दिया होगा। पर क्या हम एक छोटा सा काम नहीं कर सकते। रीचार्ज के लिए ऑनलाइन माध्यम चुनने से बेहतर छोटे विक्रेताओं से रीचार्ज नहीं करवा सकते। कर सकते है एक छोटी सी पहल बड़े काम कर सकती है।

सोचिएगा ज़रा

छोटी सी पहल |  लघु कथा
मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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वो आखिरी मुलाक़ात – लघु कथा

“Meet Me at Gol Park…Important बात करनी” Suhani Text Recieved

बड़ी देर तक दोनों में कुछ भी बातें ना हुई। आखिरकार समर्थ नें हंसकर अपनी कोशिश करने के हाथ बालों को सहलाने लाया।

हाथ झटकते हुए सुहानी नें कहा, “थोड़ा हद में रहो। I am not your assets..Got it…Mr. Samarth…”

समर्थ नें बड़ा अचंभित होकर सुहानी को एक टक देखने लगा। फिर अपना हाथ हौले से हटाकर अपने चेहरे को ढाँप लिया। कुछ देर तक सोचा असल में पिछले पाँच साल में ये पहली बार था जो सुहानी नें इतना rudely बात किया था। समर्थ के हाथ जाने कितने यादों की खून से सने, भीगे हुए मालूम पड़ रहे थे। उसको समझ नहीं आ रहा था कल तक तो सब ठीक था आज अचानक इतनी दिक्कत कहाँ से हो गयी।

“और ये इमोश्नल ड्रामा बंद करो। मेरा दिमाग खराब हो जाता। पागलपन अपने पॉकेट में रखा करो।” सुहानी नें गुस्से में कहा

पर समर्थ के आँसू कहाँ रुकने वाले थे। शायद इतना मजबूत लाइफ़स्टाइल का समर्थ खुद के यादों के आगे असमर्थ कैसे हो जाता।

“मैं रो नहीं रहा हूँ बोलो कौन सी बात करनी” समर्थ नें आवाज़ में जोर लगते बोला
“हाँ तो सुनो। तुम्हारे साथ रहकर मेरी ज़िंदगी कैद हो गयी है। हर चीज का हिसाब देना पड़ता। कहाँ जाती हूँ क्या करती हूँ सब कुछ। ये सब से मैं अब पक चुकी हूँ। सो तुम मेरे बगैर जीना शुरू कर दो। ना तुम्हें दिक्कत ना मुझे दिक्कत।” सुहानी से दो टूक सा जवाब उसके मुंह पर दे मारा

“अरे ऐसा कहाँ है। कौन किसकी आजादी छीन रहा। मैं तो तुम्हारा खयाल रखने की वजह से ऐसा कहता रहता हूँ। रूहानी प्लीज इतना rude ना हो हम अच्छा नहीं लग रहा। जो वजह है वो बताओ ना मेरा दिल नहीं मान रहा।” समर्थ नें हबसते हुए कहा

Care My Foot…तुम सब care का हवाला देकर हम लड़कियों की आजादी पर डाँका डालते हो। और इस मुलाक़ात को आखिरी समझना दुबारा मेरे से कांटैक्ट करने की कोशिश भी मत करना। मैं तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहती।

I Hate You … I Hate You …. I Hate You

सुहानी…सुहानी…एक बात मेरी भी सुन लो … चिल्लाता हुआ समर्थ उसके पीछे भागा पर सुहानी नें अपना बैग उठाया और बिना पीछे एक बार भी मुड़े सीधा चलती गयी। उसके कदम तेज और तेज चलते जा रहे थे। मानो वो किसी दायरे से बाहर भागने की कोशिश में हो।

समर्थ बैठ गया। उसको कुछ बातें समझ नहीं आ रही थी। उसको सारी बातें एक साथ रील दर रील घूमने लगी। शायद ये वही पार्क था जहां से उसकी नई ज़िंदगी नें करवट ली थी। उसको जीना पहाड़ लगने लगा था। अचानक से सुहानी का व्यवहार उसको पच ही नहीं रहा था। क्यूंकी पाँच साल इतना कम समय न होता की कोई एक दूसरे को जान-पहचान ना पाए। फिर भी जो हो रहा था उसपर वो विश्वास कैसे ना करे। अजीब सा असमंजस में समर्थ कभी अपना हाथ दीवाल पर मार रहा था तो कभी पाँव जमीन पर पटक रहा था।

दुश्मनों से तो लड़ा जा सकता पर यादों से लड़ना आसान काम कहाँ।

पर ये mystery कहाँ ज्यादा देर टिकने वाली थी। समर्थ थोड़ा शांत हुआ तो देखा एक रंग-बिरंगा कार्ड उसके बगल में गिरा हुआ था।

सुहानी त्रिवेदी वेड्स अभिलेख शुक्ला। बस बाकी माजरा समर्थ के आगे आईने के समान साफ था। सुहानी का बदलाव इसीलिए था कि वो मेरे दिल में नफरत भर सके। वो धीरे धीरे पार्क से निकलने लगा। तो देखा सुहानी वही बैठी रोए जा रही है।

सुहानी नें समर्थ को नहीं देखा। समर्थ नें जल्दी से कार्ड अपने शर्ट में डाल दिया।

सुहानी….एक बार सुनो तो मेरी बात सुन लो….समर्थ नें फिर आवाज़ लगाई।

समर्थ की आवाज़ सुनकर सुहानी अपने आँसू पोछते हुए झट से पीछे घूमी और बोली….”गधे… नालायक…तुम्हारे भेजे में कोई बात आसानी से आती है की नहीं। मैं तुमसे प्यार नहीं करती। नहीं करती नहीं करती।”

“तो किससे करती हो प्यार अभिलेख शुक्ला से”, समर्थ नें कार्ड दिखाते हुए बोला।

अब सुहानी को रोकना नामुमकिन था। उसके आँसू अब समर्थ के आगे ही बिखर पड़े। सुहानी लिपट गयी समर्थ से। बस दोनों के आँसू नें ही जाने कितने सवालों के जवाब खुद ब खुद दे दिये।

I will love you forever….जहां से कहानी शुरू हुई थी आज शायद वही पर आकर थम गयी….थम जाना कहना थोड़ा गलत होगा।

प्यार थमता नहीं। रुकता नहीं चलता जाता है। बस वो मुलाकात जरूर आखिरी थी।
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वो आखिरी मुलाक़ात – लघु कथा
©खामोशियाँ – २०१५ | मिश्रा राहुल

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ओवरटाइम

ओवरटाइम करते करते रात के 9 बज गए थे। शोभा नें बाहर झांक कर देखा। ऑफिस के बाहर की गालियां एकदम सूनसान सी दिख रही थी। जल्दी से शोभा नें अपना सेलफोन निकाला पर ध्यान ना देने के वजह से वो भी लाल-बैटरी दिखा रहा था। जैसे ही उसने अपने दोस्त को फोन लगाने की कोशिश की फोन की चमकती स्क्रीन अचानक से मौन हो गयी।
दूर-दूर तक धीमे कदम से चलते हुए अपने दोनों हाथो को क्रॉस करके अपनी फ़ाइल सीने से लगाए सहमे हुए चली जा रही थी।

ऑटो-स्टैंड पर बड़ी देर इंतज़ार करने के बाद भी ऑटो नहीं मिला। शोभा अकेले पैदल घर जाने का जोखिम उठा नहीं सकती थी। वो कोसे जा रही थी, कभी खुद को कभी बॉस को। एक दिन काम नहीं करती तो क्या हो जाता। आज अगर कुछ हो गया तो उसका क्या होगा। जाने कितने सारे ख्याल उसको एक-बाद एक घेरे जा रहे थे। वो किसी अंधेरे घने जंगल में जैसे फंस गयी थी। आज कुछ ठीक नहीं लग रहा था उसको।

तभी पीछे के तेज़ हॉर्न नें शोभा को अपने सोच से बाहर आने को मजबूर कर दिया। तीन लफंगे दोस्त उसके बगल से बड़ी तेज़ मोटरसाइकल चलाते हुए गुजरे।

शोभा को तो जैसे करेंट लग गया। सन्न सा हो गया उसका पूरा बदन। पर किसी तरह उसने खुद को मजबूत किया। पर उसने देखा मोटरसाइकल कुछ दूर जाकर रुक गयी थी। साथ ही साथ यू-टर्न लेकर उसके पास आते जा रही थी।

इधर मोटरसाइकल पास आते जा रही थी उधर शोभा की सांसें तेज़ भागते जा रही थी। उसके कदम और तेज़ हो गए मोटरसाइकल की आवाज़ शोभा की कानो को चुभते जा रही थी। अब शोभा लगभग भाग रही थी और तेज़ बहुत तेज़ बिना पीछे देखे सीधा और सीधा।
अचानक लाइट बूझ गयी मोटरसाइकल रुक गयी इधर शोभा के कदम भी थम गए।

पीछे से एक आवाज़ आई

“शोभा… हैलो….!!”

शोभा को अपना नाम किसी अजनबी से सुनकर बड़ा अजीब सा लगा। उसने पलट कर देखा तो आयुष खड़ा था।

“ओह आयुष तुम….!!”….शोभा झट से उसके गले लगकर फफकने लगी। आज तुम ना होते तो क्या हो जाता।

“शोभा…कूल डाउन….रिलैक्स कुछ नहीं होता।” आयुष नें कहा

हर बार भगवान किसी ना किसी को आयुष बनाकर जरूर भेजते। उसने शोभा के आँसू को पूछते हुए कहा।
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ओवरटाइम | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (२२-मार्च-२०१५)

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अधूरी कॉफ़ी – लघु कथा

दो रंग-बिरंगे मग में कॉफ़ी किसी का इंतज़ार कर रही थी। दोनों के धुए निकल एक दुसरे में घुल जा रहे थे। मानो बरसों के इंतज़ार के बाद कोई मिलने आया हो। वो हाथो में कप पकडे, जाने किस ख्याल में खोया था..यूँ कभी कॉफ़ी देखता तो कभी सेलफोन में कुछ तस्वीरों को उँगलियों पर घुमाते जाता…कॉफ़ी मग की डिजाइनिंग हू-ब-हू उसी चित्र से मिलती जान पड़ रही थी..पीछे की पढ़ी हरी-नीली टाइल्स भी..!!

वो अपनी कॉफ़ी पीता और चियर्स कर दुसरे सीट पर किसी से बात करता। उसको मनाता, समझाता प्यार करता। पर मैंने खुद करीब जाकर देखा वहाँ कोई नहीं था।

ये मालूम तो हो गया था कि बड़ा गहरा रिश्ता है उस जगह का उसके के साथ। उसके चेहरे के भाव घड़ियों की सूइयों पर चल रहे थे पल-पल बदलने को आमदा। ढेरों सामानों के बीच उलझा-उलझा सा था वो। उस लिफाफे में ऐसा क्या था जो उसके आँखों को भीगने पे मजबूर कर रहा था। कुछ बोतल बंद टुकड़े, कैप्सूल में उलझे सालों के पीले पन्नो में रोल किए।

उसको ना आज मौसम की फ़िक्र थी ना लोगों की। उसकी दुनिया बस उसी टेबल के इर्द-गिर्द सी थी। वो कुछ सोचता फिर लिखता। उसकी उँगलियों की हरकत से बखूबी दिख रहा था कि वो हर बार कुछ एक जैसे शब्द ही लिखता। काफी देर हो गए लेकिन दूसरा कॉफ़ी पीने वाला नहीं आया। उसकी कॉफ़ी मग उसके आँखों के झरने से पूरी तरह लबालब हो चुकी थी।

मुझे उससे पूछने की हिम्मत तो नहीं हुई पर होटल के मालिक से पूछा तो पता चला पिछले पांच सालों से आकाश दुनिया के किसी कोने में हो वो टेबल आज के दिन पूरे टाइम उसके और किसी निशा के नाम से बुक रहती। हाँ निशा मैडम अब ना आती पर उनकी पी हुई कॉफ़ी मग आज भी आकाश सर लेके आते।…
मैं कुछ बोल ना पाया बस सोचता रह गया…..और जुबान एक ही शब्द भुनभुनाते गए….!!
Love is Happiness…Love is Divine…Love is Truth…!!!

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अधूरी कॉफ़ी – लघु कथा
©खामोशियाँ // मिश्रा राहुल // (ब्लोगिस्ट एवं लेखक)
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१० पैसे की दुआएँ – लघु कथा

काफी पहले की बात है काफी छोटा था मैं। सुबह अभी-अभी जागी थी। चारो तरफ लोग मधुर बेला का मज़ा ले रहे थे। लोग व्यस्त थे अपने में ही। मैं अभी चाय की प्याली लेकर पहली चुस्की लेने को तैयार था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने उठकर दरवाजा खोला। देखा फटे चिथड़े से लिपटी एक वृद्धा खड़ी थी। आंखो में उसकी सारी परेशानियाँ देखी जा सकती थी। मैं उन्हे थोड़ी देर तक देखता ही रह गया। फिर उनके कटोरे पर नज़र गयी। उसमे सिर्फ १० पैसे पड़े थे। मेरा घर मुहल्ले में काफी घरों बाद में पड़ता है। मैं यही सोचने लगा कि क्या आज दुनिया इतनी एडवांस हो चुकी हैं कि नई मूवी देखने में वो बालकनी लेते डीसी नहीं, आइसक्रीम नए फ्लेवर की ही खाते भले उसमे ५०-६० रुपए अधिक गवाने पड़े। लेकिन वृद्धा के कटोरे को देख कर लगा कि मुहल्ले वाले तो सारे गरीब हैं।

मैं अंदर गया और अम्मा से बोला। बाहर देखिये कोई आया है उन्हे कुछ दे दीजिये। अम्मा ने १० रूपए दिये। मैं सोचा इन दस रुपए से आखिर उनका क्या होगा। अम्मा मेरी हालत समझ चुकी थी। उसने तुरंत १० रुपए मे दो शून्य और जोड़ दिये। मैं भी खुशी खुशी उन्हे देने को गया मुझे लगा आज आशीर्वाद मिलेगा बहुत ज्यादा। आखिर इंसान को और क्या चाहिए आशीर्वाद ही तो ताकि वो आगे बढ़ सके, नाम कमा सके। यही सब सोचते मैं वृद्धा के समीप आ गया।

मैंने बोला, “दादी ये लीजिये १००० रुपए। इससे कुछ दिन तो आप आराम से गुज़ार सकेंगी।”
वृद्धा ने जवाब दिया, “मैंने आज तक भीख नहीं मांगा बेटा, इसलिए मुझे इसे लेने में लज्जा आ रही। आज अगर मेरा बेटा जिंदा होता तो वो मुझे इस हाल में नहीं छोड़ता।”
मैं बड़े पेसोपेस में फंस गया। छोटा सा तो था मैं इतनी सब बातें मेरे भेजे की परिधि से बाहर की थी।

फिर भी मैंने प्रयास किया,”दादी मेरे पास एक उपाए है।”
उन्होने से आश्चर्य से पूछा,”क्या”
मैं जवाब दिया,”दादी आप मुझे अपना १० पैसा दे दीजिये और मैं आपको ये दे दूंगा। दोनों पैसे ही तो है इंसान के द्वारा बनाए। आखिर दोनों में फर्क क्या केवल दो शून्य का। वैसे भी शून्य का कोई वजूद नहीं होता।”

वृद्धा समझ गयी थी कि आज बच्चा उन्हे वो दे कर रहेगा। थोड़ी देर तक उन्होने सोचा फिर मुझे गले लगा लिया।

आँसू रुक नहीं रहे थे। झरते ही जा रहे थे। आज जब भी मैं वो १० पैसे देखता हूँ तो सोचता आखिर ये उनके दस पैसे ही तो थे जिसने मुझे आज इतना समजदार बना दिया कि मैं दुनिया को परख सकूँ /समझ सकूँ ।

तो दुआ ही तो थी दादी की बस १० पैसे की दुवा।
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१० पैसे की दुआएँ – लघु कथा
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(३१-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

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नई ज़िंदगी-लघु कथा

सुबह के सात बजे थे। गर्मी के दिन बड़े सुबह से ही सूरज आग बरसाने को चले आते। कृपाल शर्मा अभी बिस्तर पर लेटे थे। एक फोल्डिंग मेज पर रखा पुराना फिलिप्स का रेडियो बड़े शान से बज रहा था।

“आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा बेईमान है…. आज मौसम…!”

गीतकार : आनंद बक्षी, गायक : मोहम्मद रफी, संगीतकार : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल…..कृपाल शर्मा जी बिस्तर से अंगड़ाई लेते लेते बोल ही रहे थे कि रेडियो ने चुप्पी साध ली। बजते बजते रुक गया।

“अरे जी क्यूँ नहीं बदल डालते ये खटारा रेडियो। जब तक पटको ना चलना शुरू ही नहीं करता।” श्रीलता ने हँसते हुए कहा

शर्मा जी थोड़े उत्तेजित होकर बोले, “बूढ़ा तो मैं भी हो गया हूँ कुछ साल मे रिटायर होने को हूँ फिर हमे भी बदल लेना। अरे भाग्यवान, ये हमारे शादी की निशानी है ऐसे कैसे बदल दूँ इसने जाने कितने गाने सुनाया है हमे। हँसाया है….रुलाया है….पुचकारा है…. चिढ़ाया है। यादों का पूरा खजाना है ये “

श्रीलता ने बाल सुलझाते हुए बोला, “बस करो अपनी फिलोस्फी मेरे समझ नहीं आती औरों को भी देख चला करो दुनिया एमपी3…वॉकमैन तक चली गयी और ये रेडियो ढो रहे।” अच्छा जल्दी करिए ऑफिस को लेट होंगे।

शर्मा जी मुंह मे ब्रश फंसाए सारे कमरे की तलाशी ले ली। ओह भाग्यवान, सुनती हो “संजीत नहीं दिख रहा कहीं पर भी। चला गया क्या वो मिला नहीं मुझसे इस बार भी जाने से पहले।”

श्रीलता ने किचेन से आवाज़ लगाई, “हाँ चला गया!! वो रहता ही कितना देर है अब काम होता तो आता, काम रहता तो बात करता। खैर जाने दीजिये ना अब बड़ा हो गया है अच्छा-बुरा समझता। जीने दीजिये उसको उसकी ज़िंदगी और आपके लिए हम है ना।”

वो तो सही है भाग्यवान पर पुराने दिन जेहन से हटते नहीं, जब उसकी टूटी साइकिल को मैं एक कंधे पर उठाकर और दूसरे पर उसको लिए बाजार जाया करता था। पर क्या आज उसी नयी ऊड़ी मे बैठने के लिए मैं फटीचर हो गया हूँ।

“शर्मा जी जाने दीजिये ना, और ऊड़ी नहीं ऑडी होता है। आप भी ना अच्छा भला नाम बिगाड़ देते ” श्रीलता ने पूरे माहौल के गमो को अपने आँचल से पोछकर एक हंसी की फुहार छोड़ दी। काफी हद तक यही दिनचर्या रहती थी कृपाल शर्मा और श्रीलता के दिन की।

शर्मा जी रोज की तरह आज भी अपनी बजाज चेतक स्कूटर से निकल गए। स्कूटर भी वैसे ही जिसको बिना सलामी दिये स्टार्ट कहाँ होती। फिर श्रीलता का वही रोज का ताना, जिसको खाए बिना ना शर्मा जी का खाना हजम होता था ना श्रीलता का दिन गुजरता था। यही सब छोटी-छोटी बातें ही तो होती जो रिश्तों को एक नया आयाम देती जाती।

आज दिन थोड़ा अजीब सा था और दिन जैसा तो कतई नहीं। आज सारे के सारे अशुभ संकेत किसी अनहोनी को इशारा कर रहे थे। सुबह जब मिसेज शर्मा मंदिर जा रही थी तो बिल्ली ने रास्ता आधा कर दिया, फिर आज दूध भी पतेली से बाहर आ गया, फिर बाथरूम का शीशा चटक गया। आज सारे के सारे अशुभ संकेत देख श्रीलता ने शर्मा जी को सचेत किया, पर कृपाल शर्मा रुके नहीं और निकल पड़े अपने चेतक पर।

अभी कुछ ही देर बीते थे। शर्मा जी आधे रास्ते पर थे। वहीं दूसरी तरफ से एक तेज़ी से आती यामाहा R15 ने शर्मा जी के चेतक के परखच्चे उड़ा दिये। साथ ही वो लड़का भी लहूलुहान हो कर वही दम तोड़ दिया। शर्मा जी की साँसे अभी चल रही थी, पर खून बहुत बह चुका था। इसी वजह से वो अचेत पड़े थे। लोगों ने शर्मा जी को बगल की निजी अस्पताल मे भर्ती करा दिया।

उधर, घर पर श्रीलता परेशान हो रही थी। बार बार उसकी नज़रें एक बार फोन पर जरूर अटक जाती कि अभी घंटी बजेगी। पर मन ही मन वो ईश्वर से मदद भरी आँखों से निहार भी रही थी तभी फोन की घंटी बज ही गई। जो हुआ था उसे सुनकर उसके हाथ पाँव फूलने लगे। हॉस्पिटल के कर्मचारी ने बताया कृपाल शर्मा का एक्सिडेंट हो गया है।

श्रीलता तेज़ी से भागती हुई अस्पताल पहुंची वहाँ उसे पता चला कि शर्मा जी की गाड़ी विधायक के लड़के से टकरा गयी है। साथ ही विधायक के लड़के का वहीं देहांत हो गया। सर पर चोट लगने की वजह से शर्मा जी कोमा मे चले गए।

श्रीलता को कुछ सूझ नहीं रहा था उसने संजीत को फोन मिलाया, पहली रिंग मे फोन नहीं उठा। फिर उसने हार नहीं मानी और एक नयी आस से नंबर घुमाया अबकी फोन उठ गया।

“बेटा!! संजीत पापा का एक्सिडेंट हो गया है बेटा, वो कोमा मे है।” श्रीलता ने हबसते हुए कहा
“मम्मा!! जरूरी मीटिंग है तू है ना वहाँ देख ले ना पापा को मैं आकर उन्हे सही तो कर नहीं दूंगा” संजीत ने सीधा जवाब दिया
“श्रीलता अब समझ गयी थी कि ये लड़ाई उसे अब खुद ही लड़नी होगी”, उसने खुद को हिम्मत बँधाते हुए बोला

श्रीलता सोच रही थी कि अचानक ही इतना कुछ कैसे बदल सकता है। एक ओर संजीत को कोस रही थी तो दूसरी ओर भगवान को और आँसू भी सूखने मे नाकाम होते जा रहे थे। यही सब सोचते सोचते वो कब अस्पताल के बेंच पर सो गयी उसे खबर ना हुई। एक शांति जैसे पूरे वातावरण मे बस गयी।

पर शांति कहाँ ज्यादा देर टिकने वाली थी। एक तेज़ चिल्लाहट की आवाज़ ने पूरे अस्पताल को झकझोर दिया। विधायक और उसके कुछ गुर्गे अस्पताल मे बस एक ही नाम चिल्लाते आ रहे थे। कौन है कृपाल शर्मा?? कौन है कृपाल शर्मा?? और वो भी क्यूँ ना उसका जवान लड़का जो मरा है। तब तक कमरा नंबर 13 के दरवाजे पर दस्तक हुई। श्रीलता ने उठकर दरवाजा खोला।

हाँ आप कौन है?? किससे मिलना है?? श्रीलता ने गंभीरता से पूछा

“हमे मिलना-विलना नहीं है बस बताने है कि जब बुड्ढा ठीक होगा तब वो सीधा जेल मे होगा। तो तू बस यही दुआ कर कि बुड्ढा ठीक ही ना हो। तुझे तो पता ही होगा की पुलिस-कानून मेरी जेब मे ही रहता। मैं जो चाहूँ वो होगा।” बाकापा विधायक हरीश कुशवाहा ने डाइलॉग दिया और इतना बोलकर वो चला गया

श्रीलता एक भोली सी महिला को ये सब कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिर गलती उसके लड़के की थी जिसने शर्मा जी का ये हालत कर दी ऊपर से आके रौब जता रहा। आखिर समाज को हो क्या गया है दूषित हो चुका है पूरी तरह। वो दिन ऐसा था कि कटने का नाम ही नहीं ले रहा था। ना संजीत की मीटिंग खत्म हुई ना ही वो आया, और तो और उसका एक फोन तक भी ना आया। अब मिसेज शर्मा को अपने बेटे से चिड़ होने लगी थी।

दिन गुजरते गए। श्रीलता ने भगवान का दामन नहीं छोड़ा। माँ दुर्गा की कृपा हुई और शर्मा जी कोमा से वापस आने के साथ साथ स्वस्थ होते चले गए। एक तरफ श्रीलता ये सोच कर खुश होती की शर्मा जी ठीक हो रहे वहीं दूसरी ओर उसे हरीश कुशवाहा विधायक की धमकी भी कानो मे गूंज रही थी। उसने उसकी आँखों मे बदले की चिंगारी देखी थी। पर उसने शर्मा जी को इस बारे मे कुछ बताया नहीं सारा दर्द खुद झेल रही थी। वो उनके चेहरे की हल्की मुस्कान खोना ना चाहती थी।

पर जिसका डर था वो दिन आ ही गया। कुछ पुलिस वाले आ गए शर्मा जी को ले जाने। श्रीलता और डाक्टर ने काफी गुजारिश की, “शर्मा जी अभी चलने फिरने लायक नहीं” पर वो कहाँ सुनने वाले। सही काम पुलिस वाले कभी करते नहीं और गलत मे इतनी तेज़ी दिखाते की क्या बात हो।

श्रीलता फिर चक्रव्यूह मे फंस गयी। खुशियाँ आई भी तो बस जीभ झुठार कर चली गयी। श्रीलता ने शहर के बड़े से बड़े वकील के पास गुहार लगाई, पर कौन खड़ा होगा हरीश कुशवाहा के सामने सीधे टक्कर लेने के लिए वो भी बिना मतलब के। एक वकील खड़ा हुआ पर शायद वो नया था शहर मे और नौकरी पेशे मे भी। हरीश ने अपनी सारी तिकड़म भिड़ा के आखिर शर्मा जी को सजा दिलवा ही दी।

ये सब इतने जल्दी जल्दी हो गया की श्रीलता कुछ बर्दास्त नहीं कर पायी और अंततः उसकी नन्ही जान ने मिट्टी के शरीर को त्याग दिया। शर्माजी बहुत दुखित हुए। उनकी तो दुनिया उजड़ गयी थी बस एक दिन के एक्सिडेंट से, वो सोच रहे थे काश उन्होने श्रीलता की बात मान ली होती। एक दिन ना जाते ऑफिस आखिर क्या बिगड़ जाता, वगैरा-वगैरा। बेटा संजीत को बिन बताए ही शर्मा जी ने खुद ही श्रीलता का अंतिम संस्कार कर दिया। अब तो शर्मा जी को जीने की तमन्ना भी नहीं थी। फिर घर क्या जेल क्या, घर पे रहना तो जेल से भी दूभर था। शारीरिक कष्ट झेल लिए जाते पर यादें जो कचोटती वो दर्द असहनीय हो जाता। हर जगह हर चीज़ पर श्रीलता की यादें जुड़ी थी। यहाँ बैठ खाते थे, यहाँ बैठ झगड़ते थे। शर्मा जी जेल चले गए बस रेडियो ले गए उस घर से। जान थी उनके लिए वो रेडियो।

जेल मे भी कैदियों से उनका संबंध काफी तेज़ी से बंधता गया। शर्मा जी थे भी ऐसे व्यक्तित्व के आदमी। जो उनसे मिल लेता था मानो वो उसको अपना बना लेते थे। जेल मे कृपाल शर्मा बाबूजी के नाम से जाने जाते थे। जेल मे भी लोग बड़े जल्द बाबूजी की मुरीद होते गए।

बाबूजी-बाबूजी ये वो शब्द है जिसे वो ताउम्र सुनने को तरस रहे थे पर वो मिला कहाँ कैदियों से। बाबूजी की बात जेल मे हर कोई मानता था वो जेलर जिसको सबसे सख्त जेलर की उपाधि मिली थी वो भी नर्मदिल होता चला गया। कुछ कैदी उनके पैर दबाते, कुछ उनका सर। उन्हे तो कैदी अच्छे और दुनिया वाले बुरे नज़र आ रहे थे। उनके लिए तो गुनहगारों की परिभाषा बदल गयी थी। हरीश कुशवाहा और संजीत शर्मा ये दोनों ही तो गुनहगार थे उनके जीवन के, पर वो तो आजाद घूम रहे बाहर और ये बेचारे जो समाज की नज़र मे अपराधी हैं, चोर है, लूटेरे है वो यहाँ जेल मे पड़े है।

शर्मा जी खुश तो थे पर श्रीलता को याद कर दुखित हो जाते थे। जेल मे इतने जल्दी समय गुज़रा कुछ पता ना चला। शर्माजी को उनके बेहतर आचरण की वजह से सजा घटा दी गयी थी, उनके रिहाई का भी दिन आ गया। अब तो मानो पूरा मंज़र गमगीन हो गया। आम तौर पे ये खुशी की सौगात लाता, पर कोई भी किसी कीमत पर कृपाल शर्मा को छोडने को तैयार ना था। अब ये बात कौन कहे शर्मा जी से, कहीं शर्मा जी बुरा ना मान जाए।

जेल की चाहदीवारी पर चाँद अटक सा गया था। रात रुक सी गयी थी जैसे बढ़ने को तैयार न हो। सारे चेहरे एक दूसरे को देख रहे थे। मायूस जैसे आज किसी ने खाना तक ना खाया पूरा खाना वैसे का वैसा ही पड़ा था। शर्मा जी ने खुद भी खाना ना खाया वो तो और भी परेशान थे। जिससे दिल लगाते थे खुदा उसे ही उनसे छीन लेता था। खैर रात बीती किसी तरह।

सुबह सभी जल्दी उठ गए आखिर उन्हे शर्मा जी को विदाई जो देनी थी। शर्मा जी भी तैयार थे जाने के लिए उन्होने अपना सामान बांध लिया था। चलते-चलते उनके कदम रुक जा रहे थे। वे बार बार उन मायूस चेहरो को पलटकर देख रहे थे। सबसे गले मिलकर शर्मा जी को अनुमति दी।

“बाबूजी आप बहुत याद आओगे”, सभी ने एक सुर मे कहा और कहते ही सारी आँखें नम हो गयी। शर्मा जी भी उन्हे गले लगाकर उन्हे पुचकारा। शर्मा जी निकल चुके थे।

थोड़ी देर बाद गेट पर दस्तक हुई। दरवाजा खुला तो एक छोटी कद-काठी का बुड्ढा आँखों पर काले फ्रेम का चश्मा लगाए खड़ा था। अरे शर्मा जी वापस आ गए। एक खुशी ने पूरे गमो के माहौल को बदल दिया।

शर्मा जी ने कहा किसे मैं अपना कहूँ या किसके लिए मैं बाहर जाऊँ मेरा परिवार तो यही है। ये मनोज, ये गुल्लू, ये सुनील आखिर यही तो है मेरा परिवार। मैं इस इंतज़ार मे था की तुम लोगों मे से कोई मेरा हाथ पकड़ेगा और बोलेगा “बाबूजी आप जाइए मत यही रह जाइए” पर ऐसा हुआ नहीं। तभी मैं खुद ही चला आया मेरे सारे जीवन की कमाई तुम लोगों की ही है। तुम लोग सिर्फ कैदी नहीं मेरे अपने भी हो।

सभी लोग बड़े शांत से खड़े थे और शर्मा जी का रेडियो गाए जा रहा था।

“ज़िंदगी के सफर मे गुज़र जाते है जो मुकाम वो फिर नहीं आते”
“गीतकार : आनंद बक्षी, गायक : किशोर कुमार, संगीतकार : आर डी बरमन…..” शर्मा जी ने भुनभुनाया।

शर्मा जी ने आसमान की ओर देखकर बस इतना कहा इंसान मजबूरी मे काफी गुनाह कर जाता हर आदमी उतना बुरा नहीं होता जितना समाज दिखाता। पर भगवान तू सजा थोड़ा गलत दे जाता। मेरी ज़िंदगी मे जो अच्छे है सज़ा उन्हे ही ज्यादा दी तूने क्यूँ…???

श्रीलता आज तुम्हें कितना याद कर रहा मैं।
– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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माँ

आज सोमवार था। सुबह के आठ बजे थे। रोनित अभी तक बिस्तर पर लेटा हुआ था। हाँ अलार्म जाने कितनी बार उसके कानो को छु के निकल गया पर रोनित उठने का नाम नहीं ले रहा था। सामने शिव मंदिर पर भजन-कीर्तन की जोरदार आवाज़ ने रोनित को जगा ही दिया।

रोनित एक छोटा सा बच्चा महज़ 12 साल का। हाँ छोटा ही उसकी माँ के लिए अब भी वो। रोनित को सुबह-सुबह मे स्कूल जाना होता था पर वो अक्सर देर से उठने की वजह से हमेशा भागता ही जाता था।
हर दिन की रूटीन की तरह आज भी मिसेज अग्रवाल सुबह उठी। पूरे घर की सफाई की, सारे मैले कपड़े धो डाले , धुले कपड़े आलमारी मे तह कर दिये, बेटे के लिए नाश्ता बनाया। ओफो इतनी सारी ऊर्जा आखिर कैसे मिलती उनको। सारे काम करने पर भी मिसेज अग्रवाल थकती नहीं। हाँ मिसेज अग्रवाल ही तो बुलाते लोग उन्हे, या फिर अग्रवाल आंटी, रोनित की मम्मी। यही सब उनके नाम है शायद। वो तो शायद अपना स्वाति नाम तक भूल गयी हैं।

आज भी रोज़ की तरह उनका खाना किसी ने नहीं खाया। बेटे को स्कूल की जल्दी थी और पति को ऑफिस की। पर कोई बुरा मान जाए तो उनका ख्याल रखा जाता मनाया जाता, पर माँ को बुरा मानने का सवाल ही नहीं पैदा होता। वो तो बिना पगार, बिना की स्वार्थ अपना काम करती। उसे ना तो बोनस की चिंता होती, ना ही एरिअर की। ना इतवार को उनकी छुट्टी होती ना किसी त्योहार को उनका आराम, बल्कि इन दिनो तो उनसे लोग एक्स्ट्रा काम करवा लेते। पर माँ किस मिट्टी की बनी होती कभी बुरा ही नहीं मानती।

शाम को भी थके हारे शांतनु अग्रवाल और रोनित आए। फिर खाना खाया और सो गए। शायद इस व्यस्त सी दिन-चर्या मे हर वो चीज थी पर बस स्वाति अग्रवाल छोड़कर। स्वाति को मायके गए भी काफी दिन हो गए थे। शायद एक बार ही गयी थी वो सात साल की शादी के बाद। पर स्वाति कभी इस बारे मे सोचती ना थी। अब तो रोनित और शांतनु अग्रवाल को उसकी लत लग गयी थी। यह अलग बात थी कि उन्हे पता नहीं था इस बाते मे बिलकुल भी।

स्वाति ने सोचा एक बार मैं इन्हे अपनी एहमियत दिखा दूँ। आज जब मिस्टर अग्रवाल ऑफिस से घर आए तो स्वाति ने अपने घर के याद आने का बहाना बना लिया। शांतनु तुरंत तैयार हो गए उसकी बात पर अभी भी शांतनु को एहसास नहीं था कि स्वाती चाह क्या रही। खैर रात बीती और सुबह सुबह 6 बजे की एक्सप्रेस से स्वाति अपने गाँव लौट रही थी। स्वाती का गाँव काफी दूर पर बसा हुआ था। पूरे 36 घंटे लग जाते थे उसे वहाँ जाने मे। स्वाति को मन मे तरह तरह के ख्याल आ रहे थे कि शायद उसने जल्दबाज़ी मे गलत कदम उठाया है। आखिर माँ जो थी पर फिर भी उसने अपने दिल पर पत्थर रख कर यात्रा जारी रखी।

स्वाती के जाते ही। रोनित और शांतनु की दिन-चर्या बुरी तरह प्रभावित हुई। दोनों देर से उठे आज नाश्ता नहीं था सुबह कि मसालेदार चाय टेबल से गायब थी। इस्त्री किए कपड़े नहीं थे। घर के तौलिये से लेकर, दूध लेने तक की ज़िम्मेदारी आ दो नाजुक कंधो पर थी। घर की हर चीज ऐसे मूक हो गयी थी कि मानो सब के सब स्वाति को पुकार रहे हो। रोनित को अब माँ सताने लगी वो हर बात पर माँ के किए काम को याद करता था। रोनित ही नहीं शांतनु को भी अब स्वाति की याद आने लगी थी। अभी स्वाति अपने घर पहुंची भी नहीं थी कि शांतनु ने उसे फोन कर दिया।

शांतनु बोले, “स्वाति कैसी हो”
स्वाति को विश्वास ही नहीं हुआ कि शांतनु ने अपने व्यस्त दिनचर्या मे से उसके हाल चाल के लिए समय निकाल लिया है।
स्वाती हड़बड़ाते हुए बोल पड़ी, “अच्छी तो हूँ, एक दिन मे क्या बिगड़ जाएगा”
शांतनु फिर शालीन लहजे मे कहे, “नहीं ऐसे ही आज तुमसे बात करने का दिल कर रहा था। कुछ अच्छा नहीं लग रहा ऑफिस मे हूँ बैठा। रोनित भी काफी परेशान हो रहा है तुम्हारे बिना। तुम कुछ दिन रहकर जल्दी चली आना ये घर तुम्हारे बिना सूना सा लगता है।”
स्वाति अपनी दांव मे सफल होती दिख रही थी। उसने बोला, “अच्छा अभी पहले पहुँचने तो दो आ जाऊंगी, फिर भी एक हफ्ते तो लगेंगे ही”
शांतनु भी थोड़े मायूस होते बोले, “एक हफ्ते अच्छा ठीक है। ख्याल रखना अपना।”

स्वाती ने शांतनु से बात करते ही अगले स्टेशन पर गाड़ी छोड़ दी और अगली गाड़ी कि प्रतीक्षा करने मे जुट गयी। आज स्वाती बड़ी खुश थी। इसलिए नहीं कि उसने सबको हरा दिया बल्कि वो तो खुश थी कि आज उसे अचानक देखकर रोनित और शांतनु कितने प्रसन्न होंगे। अभी स्वाति इसी उधेड़बुन मे थी कि उसकी गाड़ी उसे पुकारने लगी अपनी सीटी देकर, कि वो उसमे बैठकर चल दे घर कि तरफ। तरह-तरह के ख्वाब लिए, आज सर्प्राइज़ दूँगी सबको। रोनित से मिलूँगी, शांतनु भी होगा केवल 7 घंटो मे कितना कुछ बदला-बदला नज़र आ रहा था।
शांतनु और रोनित शाम को घर लौटे फिर समान अस्त-व्यस्त देखकर बड़े दुखित हुए। हर पल हर जगह बस बातों मे स्वाति अग्रवाल ही होती थी। दोनों इतने थके थे कि बाहर जाना दूर वो आते ही बिस्तर पकड़ लिए, पर भूख और नींद की जबर्दस्त टक्कर होती रही। काफी देर बाद आखिर कार जीत भूख की हुई।
अब रोनित शांतनु को ऐसे देख रहा थे, मानो पूछ रहे हो कि आखिर हमने क्यूँ इतना खराब बर्ताव किया की मम्मी चली गयी। दोनों की खामोश बातें जारी थी कि घर की बेल बजी।

डींग-डोंग…. डींग-डोंग…. डींग-डोंग….
शांतनु सोचते जा रहे थे आखिर इतनी रात को कौन होगा। घर मे स्वाति भी नहीं मैं खुद भूखा सो रहा कोई मेहमान हुआ तो बाहर से कुछ लाना पड़ेगा। ये लोग भी ना बिना टाइम आ जाते। जाने क्या क्या सोचते शांतनु ने दरवाजा खोला।
सामने थी,”वही 5’8″ की काया वाली गोरी सी औरत रात जिसका राग दोनों बाप-बेटा मिलकर आलाप रहे थे। शांतनु ने उसे देखते ही गले से लगा लिया। मानो दोनों कितने जनम से मिले ना हो। रोनित भी सामने आ गया और एक सांस मे उसने सब कुछ मम्मा को ऐसे बता दिया जैसा वो कभी बचपन कभी स्कूल से आकर बताया करता था।

पाँच मिनट तक तीनों एक दूसरे से लिपट रोते रहे। भूख के सूखे खेत को तीनों ने अपनी आँसुओ से सींच दिया।

दुनिया मे कोई कितना भी बदल जाए माँ नहीं बदलती। माँ एक कम्यूनिटी है। वो अनूठी है वो बदल सकती ही नहीं। वो सच्ची होती है। आखिर तभी तो भगवान ने उसे अपना दर्जा दे रखा है।

आखिर मे मुन्नावर राना का एक शेर लिखना चाहूँगा बिना उसके ये कहानी पूरी नहीं होगी।
ख़ुदा ने यह सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख़्‍शी है, कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं।

Advance Happy Mothers Day 11 May ’14

मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)
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परिस्थिति

बादल गरज रहे, काले काले बादलो से पूरा आसमान पटा पड़ा है। मोर अपनी पंखों को फैलाकर नाचने के तैयारी मे खड़े। सूरज अपनी दुम दबाये उसे पीछे-पीछे चल रहा। कभी बाहर आता तो कभी छुप जाता। अभी लोग घरों से निकल खुशियाँ मना रहे थे कि बारिश शुरू हो गयी। सबके चेहरे पर खुशी का पुरजोर आलम, आखिर हो क्यूँ ना पिछले काफी दिनो से जो यहाँ बरसात की एक बूंद तक नसीब ना हुई थी। एक मनोहारी वातावरण तैयार हो चुका था। इतने मे ट्रेन के इंजिन की एक ज़ोर सी आवाज़ ने सत्यपाल की आँखें खोल दी।

सुबह हो चुकी थी और सामने था चटक धूप वाला तपता सूरज। सत्यपाल चिल्ला उठा “सपना था हाँ सपना था”।

सत्यपाल सिंह, लखीमपुर खीरी से करीब 45 किमी उत्तर की तरफ बसा बसतौली गाँव का एक निहायत ही गरीब गन्ना किसान। घर मे रुपए जुटाने की जुगत मे कभी सरकारी चीनी मिलों मे मजदूर की हैसियत से भी काम करते थे। नीचे जमीन खाती फसल पर सूरज काका की बेरहमी उसके जुबान पर हर समय ताज़ी रहती थी। घर मे सत्यपाल के अलावा उसकी पत्नी मंजू और उसकी एक बेटी गुड़िया थी। कभी किसी जमाने मे सत्यपाल खुद को अपने क्षेत्र के नामी किसानो मे गिनती हुए पाते थे, पर आज तो स्थिति बिलकुल पलट है। घर मे बस एक पहर ही चूल्हा जलता था, वो भी आधा अधूरा। चार लोगों की थाल हमेशा एक ही मे सजाई जाती थी। जिसमे कभी सूखा चावल होता या फिर सिर्फ रोटी। खाने के समय लोग एक दूसरे को दिलासा दे कर ही पेट भरते रहते थे।

बलरामपुर चीनी मिल की गुलारिया इकाई मे कार्यरत सत्यपाल बस किसी तरह गुजर बसर कर रहे थे। सब कुछ बीत ही रहा था किसी तरह। सत्यपाल दिन बदिन उम्र लांघते जा रहे थे। घर मे बेटी के शादी की चिंता उनका सर खाए जा रही थी। हर पहर अक्सर यही बात चलती रहती “गुड़िया की शादी हो जाए बस अपनी तो पेट काट लेंगे किसी तरह”।

मंजू सिंह स्वभाव की काफी गंभीर महिला थी। घर मे कुछ भी कमी हो पर वो शिकायत ना करती थी, बस काम चला लेती थी। एक दिन सुबह सुबह अचानक से बैठे बैठे मंजू  मौके की नज़ाकत भाँपते हुए थोड़े शरारती मुद्रा मे बोले पड़ी, “अरे एहरों सुनबो!! बिटिया का बियाह कराइबो की घर बैठहें रहिबों “
सत्यपाल अपनी लहजे मे बोल पड़े, “बियाह होई!! तनिक और इंतज़ार करी लौ, बात किहेन है दिनेशवा से”
इतना बोल कर सत्यपाल अपने रोज़मर्रा की काम मे तल्लीन हो गए।

शाम को दिनेश भी आ गया। अक्सर दिनेश ही रिश्तों को पक्का-कच्चा कराता था। सब लोग बैठ गए और इतमीनान से बात करने लगे।
“ए दिनेश, कौनों नीक लाइका होय त बतावों, आपन अवकात त तू जनते हौ, दु जून के रोटी कौनों तरहियन से सेकावेले” भाभी और सत्यपाल ने एक सुर मे अपनी राय बोल दी
दिनेश ने काफी गहरी सांस ली और कुछ चार पाँच फोटो झोले के कोनो से खींच कर बाहर कर दिये।
देखते ही देखते मंजू ने एक पकड़ इशारे से ही सत्यपाल की भी राय भाँप ली।
दिनेश भी समझ गया था। गुड़िया को अब सत्यपाल बाबू अपने यहाँ और जगह नहीं देना चाह रहे थे। खैर दिनेश ने सर हिलाया और हाथ जोड़ आज्ञा मांगते हुए बोला, “ठीक है बाबूजी हम आपकी बात इन तक पहुंचा देंगे और लेनदेन आप कर लेना, हम इस पचड़े से दूर रहते है। “
दिनेश के जाने के बाद मंजू और सत्यपाल मे अच्छी ख़ासी बात चली थी कुछ दलील देती बातें, कुछ समझ भरी बातें।

कुछ रोज़ बीते। अजीत सिंह सत्यपाल के यहाँ खुद ही पधार दिये। बातें काफी हो गयी तभी, मिसेज सिंह ने कहा अरे सत्यपाल जी मेरी बिटिया से तो मिलवा दीजिये। मंजू ने तुरंत आवाज़ लगाई, “गुड़िया आजा बेटा” ।
बिलकुल मंजू की छायाचित्र की एक नन्ही गोरी सी सचमुच की चलती फिरती गुड़िया सामने आके खड़ी हो गयी। गुड़िया को तो देखते ही कोई भी रिश्ता पक्का कर ले। सर्वगुणसंपन्न जो थी।
तो आखिर कार उन्होने भी हाँ भर दी।
सत्यपाल ने झिझकते हुए पूछा,”ठाकुर साहब आप अपनी मांग भी बता दीजिएगा हम नहीं चाहते बाद मे कोई समस्या मन-मुटाव आए”
अजीत सिंह ने शालीन पलटवार किया, “सत्यपाल जी क्या बोल रहे आप, पाप करवाएँगे हम लोगों से। अभी तक जितनी पुण्य किया है सब बर्बाद हो जाएगा”।
लड़के वाले शायद दहेज की खिलाफ थे। वो तो लड़की चाहते थे सुंदर, सुशील, बुद्धिमान। मंजू-सत्यपाल की खुशी देखते बन रही थी। आखिर एक बहुत बड़ा काम जो उन्होने कर डाला था। पंडित बुलाया गया शुभ मुहूर्त मिल गया 7 जुलाई। बात पक्की हो गयी गुड़िया-विवेक की जोड़ी अच्छी जमेगी यही दिनेश ने बोलकर मुंह मीठा करवा दिया।

तैयारियां ज़ोरों पर चलने लगी। दहेज ना लेने पर भी लड़की के ज़रूरत के समान खरीदने भी तो थे। चार महीने बस बचे थे। सारी गणित अच्छी ख़ासी बना ली थी सत्यपाल ने। कुछ पैसा जमा थे उन्हे निकालने की अर्जी भी दे आई थी। सत्यपाल अब तो दुगनी मेहनत से खेत से लेकर मिल तक सब काम कर आते थे। मिल मे भी उन्हे  काफी दिन से पैसे मिले नहीं थे, अब वे मांगते भी नहीं थे। सोच रहे थे अभी मिलेंगे तो खर्च हो जाएंगे कुछ दिन बाद ही मिले तो ही बेहतर।

हर तरफ खुशी का माहौल जमघट लगाए पाँव पसार चुका था। जिस घर मे कभी रौनक नहीं दिखती थी उसमे आज एक अजीब ही हलचल आ गयी थी। मुखरे खिल गए थे हर-किसी के। मंजू घूम फिर के बस गुड़िया की ही बात कर देती, उसे समझाते रहती। गुड़िया ससुराल मे ऐसे करना वैसे करना। सास की सेवा करना बड़ो की इज्ज़त करना, कोई कुछ भी बोले जवाब ना देना। आखिर एक ही तो बिटिया थी फूल जैसी उसे कैसे यून्ही छोड़ देती।

दिन इतनी तेज़ी से बीत रहा था। शादी की तारीख नजदीक बस बीस दिन बचे थे। सत्यपाल आज थोड़े परेशान से दिख रहे थे। रोज़ की तरह उन्होने आज गुड़िया को भी नहीं पूछा। सीधा कोने वाले कमरे मे चले गए। मंजू अपने काम मे इतनी व्यस्त थी की वो उन्हे देख ही नहीं पाई। पर सिसकने की आवाज़ सुन वो फौरन उस अंधेरे कमरे मे दाखिल हुई। वो कमरा अजीब सा काल रूपी नज़र आ रहा था आज, जो भी जा रहा था उस तरफ वो उसे लीलने की नीयत से आगे आ जा रहा था।
मंजू से सत्यपाल की ओर देखते पूछा,”क्या हुई गवा काहें एतना रोवत हौ”
सत्यपाल रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मंजू ने बड़ी मशक्कत के बाद वो कुछ समझ पाई।
अब मंजू भी उसी तरह रोने लगी। दोनों एक दूसरे को देख रोए ही जा रहे थे। मानो कोई पहाड़ सा टूट पड़ा हो।
सत्यपाल यही बोले जा रहा था, “गन्ना बर्बाद हो गया, हम बर्बाद हो गयी। हे ईश्वर ऐसे हमारे साथ ही क्यूँ करता। सूरज बाबा कभी कम भी जला करो काहें हमरी किस्मत मे आग लगा जाते। ऊपर से बैंक वाले भी”
यही सब बोलता सत्यपाल मिल की तरफ भागा।
पर मंजू रोती रही उसके सपनों के पर्दों पर मानो कोई कैंची मार दिया हो। जगह जगह से फट चुके पर्दो पर अब पुराने जैसी तस्वीर नहीं बन रही थी। मन मार कर मंजू बैठ गयी।
मंजू एक शब्द बोलते जा रही थी, “हमरी किस्मत मे ही ई काहें गोंज दिहे भगवान”। ये सब बोलते बोलते मंजू सो गयी।

उठी तो काफी लेट हो चुकी थी। पर सत्यपाल नज़र नहीं आ रहे थे। शाम तक अक्सर वो आ जाया करते थे। पर रात हो आई थी। अब मंजू जाए भी तो कैसे घर मे गुड़िया अकेली थी। तभी बाहर मची कोलाहल देख वो दंग रह गयी। या ये कहें की उसे विश्वास ही नहीं हुआ ऐसा। बहुत दूर किसी को घेर पूरे मुहल्ले वाले खड़े थे। शोर-शराबा चीख सब उसके विपरीत ही थे पर उसका मन अभी ये मानने को तैयार नहीं था। बस 100 कदम का ये सफर मानो 100 दिन ले रहा था, उसके कदम थक रहे थे। उसके आँखें और देखने की गवाही नहीं दे रही थी, कान सब सुन के अनसुना करना चाहते थे। पर परिस्थिति इस बार फिर मंजू की शक्ति जाँचने को तैयार खड़ी थी।

हाँ, सत्यपाल लेटे पड़े थे। वे मिल के बॉयलर मे उबलते पानी मे गिर के अपनी जान खो चुके थे। मिल के आला अधिकारियों से लेके मजदूर तक सब मंजू को दिलासा दे रहे थे। आखिर सत्यपाल ऐसे व्यक्तित्व के आदमी थे कि उनसे कोई नाराज़ हो ही नहीं सकता था, सिवाय ईश्वर से। भगवान से उनकी कभी बनी नहीं। काफी मंजर बदल गए थे। दुखों के बादल तो बस मंजू के आँगन मे अपना डेरा डाले कष्टों की बारिश किए जा रहे थे।
मंजू बेसुध हो चुकी थी। गुड़िया रोए जा रही थी। सबने मंजू-गुड़िया को सम्हाला। सत्यपाल का दाह-संस्कार किया।

बीस दिन बाद। गुड़िया की शादी हुई। हाँ बड़ी धूम-धाम से। सभी मजदूरों ने अपनी एक महीने का वेतन काट सत्यपाल की झोली मे दे दिया था। मिल मालिक ने भी काफी मदद की। शायद किसी बात की कोई कमी नहीं थी उसकी शादी मे। बस सत्यपाल नहीं थे।

शादी मे बैठी गुड़िया ये तय नहीं कर पा रही थी किसको धन्यवाद करें। अपने बाबूजी को जो उसकी लिए अमूल्य धरोहर थे, अपनी माताजी को जिसने कभी सुख का स्वाद ही नहीं चखा, या वहाँ खड़े उसके बाबूजी के साथियों को जिनके पास बहुत सारा पैसा तो नहीं पर हाँ दिल था बहुत बड़ा। शायद ईश्वर भी उसमे समा जाये हाँ। आपने सही सुना “ईश्वर भी उसमे समा जाए”

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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