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दुनिया

कुछ जरूरतें तेरी तो कुछ हमारी है,
इन बातों में उलझी दुनिया सारी है।

मोहब्बत की मुखबिरी कौन करता,
पूरा शहर ही इस खेल का मदारी है।

हर शख्स किसी मीठी जेल में होता,
खाकर सबने अपनी सेहत बिगाड़ी है।

चेहरे की मुस्कान उनको पचती कहाँ,
दुख बाटना ही जिनकी दुकानदारी है।

फेट रहा हूँ पत्ते लौटाने सबकुछ आज,
तेरी उम्मीद ही तेरी असल बीमारी है।

©खामोशियाँ – 2018 | मिश्रा राहुल
(26 – जुलाई -2018)(डायरी के पन्नो से)

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डायरी का डिजिटलीकरण

कभी
डायरी थी
तो कलम था,
कभी ठहरा
हुआ सा मन था।

डेहरी थी
लालटेन टांगे
कंधों पर,
ऊपर याद था
उनका मगन सा।

शाम
की छांव में
कुछ नज़्म होंठों से
सीधा कार्बन कॉपी
होते थे पन्नो पर।

आजकल
चमकते सेलफोन पर,
बटन के दाने चुंगते हैं
यादों के कबूतर।

डायरियां जैसा
भरता नहीं पन्ना इसका,
इसमें खुशबू भी नहीं
किसी भी नज़्म के इत्र की।

तारीखें सिग्नेचर,
से मिलानी पड़ती।
कभी लिखावट से
पहचान लेते थे
तबियत नज़्मों की।

कभी
जब होती है,
चर्चा नज़्मों की।
खुल जाती चमचमाती
स्क्रीन पॉकेट से निकलकर।

और दूर पड़ी
रैक पर डायरी
घूरती रहती है मुझे।

– मिश्रा राहुल | 04- अप्रैल -2018
(डायरी के पन्नो से)(खामोशियाँ-2018)

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टेपरिकॉर्डर

अपने पुराने
काठ के टेपरिकॉर्डर में
कैद करके रखी थी,
कुछ पुरानी
चुनिंदा नज़्में।

हर रोज
उसके सर पर,
टिप मारकर
जगाता था।

सुर
निकलती थी,
सामने सफेद
प्याली से टकराकर
गूजती थी बातें उसकी।

हर रोज नई नज़्म
अपनी छाप छोड़ती।
लेकर बैठता था
खाली प्याली अपनी।

हो जाती
कभी सौंधी सी,
तो कभी भीनी भीनी सी।
कुछ नज़्म
आँखे दिखाती,
तो कभी हो जाती तीखी सी।

अब
टेपरिकॉर्डर भी
रिवाइंड नहीं होता,
फंसता है उसका
पांव आजकल।

कुछ
नज़्म बोलता,
कुछ पर गला
फंसता उसका।

कैसेट से
उसकी बनती नही।
रील्स उलझकर
उसके गर्दन कसती हैं।

सोच रहा हूँ,
बेच दूं पर खरीदेगा कौन।
यादों से भरा इतने
वजन का टेपरिकॉर्डर।

– मिश्रा राहुल | खामोशियाँ
(03-मार्च-2018)(डायरी के पन्नो से)

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फागुन क बदरा (भोजपुरी)

फागुन क बदरा,
झूमत बा रे।
पासे बैठावे खातिर,
क़हत बा रे।।

उड़ाई क गुलाली,
जरा ए बाबू।
नजरिया मिलावे खातिर,
क़हत बा रे।।

झूमी झूमी खेतिया मे,
रंग छितराये,
लाली लाली गालिया मे,
बसत बा रे।

गोरी गोरी मूहवा पे,
चढ़त रंगवा।
बरवा लटियावे खातिर,
पुछत बा रे।।

खोजत बा आपन,
पुरान बालम देख।
रंगवा से नहवाए क,
खोजत बा रे।।

मीठ मीठ चढ़ल बा,
कराही चूल्ही प।
जउन जउन पकवान,
बनत बा रे।।

फागुन क बदरा,
झूमत बा रे।
पासे बैठावे खातिर,
क़हत बा रे।।

– खामोशियाँ (मिश्रा राहुल)

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बाहुबली

हर
रोज तो
मरता है
बाहुबली।

कितने
कटप्पा
खंजर करते
भरोसे का।

कितने
भल्ला
फायदा उठाते
दूरियों का।

हर
रोज तो
मरता है
बाहुबली।

– राहुल

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Breeze

Memories laden wind usually prevails when my feet cross the old bridge.


An aromatic bliss hover throughout the region. Something want to nudge my soul.
Do braided tighten with colourful ribbons. A sweet charming smiles scattering few yellowish flavours to sunflower, the envy of her.

Hands Full of Cherished Balloon getting higher with the lovedrogen gas filled up.
Something unnatural occurs when i cross the old bridge.

– Misra Raahul
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प्रेम में इस्तेहार

प्रेम में इस्तेहार बन बैठे हैं हम,
भोर के अखबार बन बैठे है हम।

सब पढ़ते चाय की चुस्की लेकर,
हसरतों के औज़ार बन बैठे हैं हम।

सुर्खियां जलकर ख़ाक हो गयी,
सोच के गुलज़ार बन बैठे है हम।

बदलता जाता नक़ाब हर घड़ी,
काठ के पतवार बन बैठे हैं हम।

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गुंजन

गुंजन करती है हर साँझ ख्यालों की ओट में,
तैरता हूँ मैं भी डूबकर छोटे यादों की बोट में।

चुनचुन कर कीमती लम्हे पुराने लिफाफे से,
छापता जाता हूँ हर रोज कागज की नोट में।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल

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नाराज़ चाँद

खिड़की
पर चाँद
अटक सा गया है।

हिलता नहीं
डुलता नहीं
गुस्से से धुआँ हैं।

मुंह फुलाए
नज़र घुमाए
बैठा है उदास सा।

कुछ
कहा-सुनी
हो गयी सितारों से।

बुझ गए
फ़लक के झालर
लापता है मनाने वाले।

कब
तक मानेगा
कब
तक जागेगा।

कुछ पता नहीं,
आज रात
देर तक होगी शायद।
आज बात
देर तक होगी शायद।
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©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(७-मार्च-२०१५)

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